नई दिल्ली. एशियन गेम्स 2026 अब खत्म हो चुका है और फ्लैश बैक में जाए तो दो ऐसे चेहरे नजर आते है जिन्होंने करिश्मा करते हुए विरोधी के जबड़े से गोल्ड मेडल छीन लिया. सबसे पहले हॉकी की बात करें तो सोचिए, मुकाबला 3-5 से पीछे है और गोल्ड मेडल दांव पर लगा है. एक खराब सेट का मतलब साफ था कोरिया के खाते में गोल्ड और भारत के हिस्से में सिल्वर. ऐसे मौके पर खिलाड़ी को सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि फौलादी हौसले की जरूरत होती है. जो कर दिखाया सविता पूनिया ने.
पुनिया जैसी ही हिम्मत कुमकुम ने तीरंदाजी में दिखाई. कुमकुम ने करो या मरो वाला सेट जीत लिया और स्कोर 5-5 से बराबर हो गया. अब दबाव साफ तौर पर तीसरी वरीयता प्राप्त दक्षिण कोरियाई खिलाड़ी पर था. सामने 17 साल की एक भारतीय थी, जो अपनी कहानी खुद लिख रही थी. वह दुनिया को एक ऐसी कहानी सुना रही थी, जो इससे पहले किसी ने नहीं सुनी थी.
दो जनरेशन, एक जुनून
यह दो महिलाओं की कहानी है. एक की उम्र सिर्फ 17 साल है और दूसरी 35 साल की अनुभवी खिलाड़ी हैं. यानी सविता की उम्र कुमकुम से ठीक दोगुनी है. लेकिन दोनों को जोड़ने वाली एक चीज है- बेहतरीन करने की भूख और देश के लिए दबाव के सबसे बड़े पलों में कुछ खास कर दिखाने की क्षमता. कुमकुम और सविता सिर्फ नागोया की कहानी नहीं हैं. यह कहानी नीरू धांडा की भी है. यह कहानी लवलीना बोरगोहेन, परवीन हुड्डा, ईशा सिंह, सुरुछि इंदर और उन तमाम भारतीय खिलाड़ियों की है, जिन्होंने मुश्किल हालात में अपने जज्बे से देश का सिर ऊंचा किया है. और सबसे बढ़कर यह कहानी नए भारत की कहानी है. अब इस कहानी को याद रखिए. इन खिलाड़ियों को पहचानिए. इनकी उपलब्धियों का जश्न मनाइए. क्योंकि नागोया ने सिर्फ भारत को मेडल नहीं दिए हैं. इसने भारत को यह भरोसा भी दिया है कि बड़े मंच पर दबाव से डरने की जरूरत नहीं, दबाव को ही अपनी ताकत बनाया जा सकता है.
शूटऑफ में शरेनी की गर्जना
कुमकुम ने परफेक्ट 10 निशाना लगाया. कोरिया की खिलाड़ी सिर्फ 8 अंक हासिल कर सकी. गोल्ड भारत का था. कुमकुम महोद एशियन गेम्स में रिकर्व गोल्ड जीतने वाली इतिहास की पहली भारतीय बन गईं. अगर इसे सनसनीखेज उपलब्धि नहीं कहा जाए तो फिर सनसनीखेज आखिर है क्या?
नागोया में बदला तीरंदाजी का समीकरण
नागोया में तीरंदाजी ने एक नया अध्याय लिख दिया . अब यह मानने की जरूरत नहीं कि कोरियाई खिलाड़ियों को हराया नहीं जा सकता. नया सच यह है कि उन्हें हराया जा सकता है और भारत के महिला और पुरुष दोनों तीरंदाजों ने इसे साबित कर दिया . दो गोल्ड और एक सिल्वर अपने नाम कर चुकी कुमकुम अब इस खेल की नई स्टार हैं. सबसे खास बात उनकी दबाव झेलने की क्षमता है. कुमकुम ने उन तमाम दलीलों को ध्वस्त कर दिया है कि भारतीय खिलाड़ी बड़े दबाव में बिखर जाते हैं. सच तो अब इसके बिल्कुल उलट नजर आ रहा है.अगर आप चीनी और कोरियाई खिलाड़ियों पर दबाव बना सकते हैं तो वे भी लड़खड़ाते हैं. वे ऐसे दबाव के आदी नहीं हैं. आपको बस उन्हें लगातार दबाव में रखना है.नागोया में यही देखने को मिला है और कुमकुम ने इसे बार-बार करके दिखाया है.
सविता पुनिया का करिश्मा
भारत 1-0 से आगे था. घड़ी में 24 मिनट बाकी थे. सामने ऊंची रैंकिंग वाली चीन की टीम थी, जिसे भारत पिछले कुछ वर्षों में हरा नहीं पाया था. तभी चीन को पेनल्टी स्ट्रोक मिल गया.यह पेनल्टी कॉर्नर नहीं था. पेनल्टी स्ट्रोक था.एक बार फिर गोल्ड मेडल दांव पर था और साथ ही LA28 ओलंपिक का क्वालिफिकेशन टिकट भी.उस एक पल में सविता समझ रही थीं कि असली दबाव क्या होता है. वह गोललाइन पर खड़ी थीं. दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था. लेकिन उन्हें शांत रहना था. वर्षों की मेहनत और तैयारी को याद रखना था. सामने से आने वाली गेंद का अंदाजा लगाना था और सही समय पर उसे रोकना था. सविता ने वही किया. उन्होंने बाईं तरफ छलांग लगाई और ऐसा शानदार बचाव किया कि चीन के गोल का दरवाजा वहीं बंद हो गया. भारत ने गोल्ड की तरफ कदम बढ़ा दिए.
ठीक दो साल पहले सविता खेल छोड़ने के कगार पर थीं. वह लगभग संन्यास लेने का मन बना चुकी थीं. लेकिन खुशी है कि उन्होंने ऐसा नहीं किया. उनके करीब रहे कुछ लोगों ने उन्हें ऐसा कदम उठाने से रोका.आज वही सविता एशियन गेम्स की गोल्ड मेडलिस्ट हैं और उन दिग्गज खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्होंने भारत को LA28 ओलंपिक का टिकट दिलाया.


