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Radhakant Ojha BJP Rajay Sabha Candiadte | inside story

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October 6, 2026
in उत्तर प्रदेश
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Radhakant Ojha BJP Rajay Sabha Candiadte | inside story


Radhakant Ojha Political Journey: ‘किस्मत मेहरबान तो गधा पहलवान’ गांव-देहात के इस कहावत को बीजेपी की राज्यसभा की नई लिस्ट ने चरित्रार्थ कर दिया है. बीजेपी ने यूपी राज्यसभा चुनाव के लिए जिन-जिन नामों को चुना है, उनमें से कई नाम किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है. सोचिए जो शख्स 11 दिन पहले बार काउंसिल का चुनाव हार ही नहीं गया, बल्कि तीसरे नंबर पर रहा हो, उस शख्स का नाम बीजेपी की राज्यसभा लिस्ट में हो तो इसको आप क्या कह सकते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर भारतीय जनता पार्टी ने उस शख्स को बार काउंसिल चुनाव हारने के बाद भी क्यों राज्यसभा भेज रही है? इसके पीछे की कहानी क्या है? क्या सचमुच में वह शख्स बीजेपी के लिए आने वाले दिनों में बड़ा एसेट साबित होगा? आखिर उस शख्स में क्या काबिलियत है, जिसके बल पर वह शख्स अब राज्यसभा में बैठेगा? सोशल मीडिया पर लोग क्यों कहने लगे हैं ‘किस्मत हो तो राधाकांत ओझा जैसी’.

बीते 24 घंटे से राजनीतिक गलियारे से लेकर सोशल मीडिया तक, बीजेपी की उस लिस्ट की चर्चा हो रही है, जिसमें कई बड़े-बड़े सूरमाओं का पत्ता साफ कर 8 नए कैंडिडेट्स ने जगह बनाई है. लेकिन चर्चा सबसे ज्यादा उस शख्स की हो रही है, जो 11 दिन पहले ही बार काउंसिल का चुनाव हार गए थे. राधाकांत ओझा इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन अध्यक्ष पद का चुनाव ही न हारे, तीसरे नंबर पर रहे थे. लेकिन 5 अक्टूबर 2026 को बीजेपी ने जिन 8 लोगों को राज्यसभा सूची जारी की, उसमें ओझा का नाम दूसरे नंबर पर था, हालांकि, 11 दिन पहले ओझा भले ही चुनाव हार गए, लेकिन दो बार वे हाईकोर्ट बार के अध्यक्ष रह चुके हैं. खास बात यह है कि उनके भाई शिवाकांत ओझा भी सपा सरकार में कद्दावर मंत्री रह चुके हैं.

राधाकांत का किस्मत कनेक्शन कैसे चमका?

राधाकांत ओझा की उम्मीदवारी के बाद सोशल मीडिया पर गोलू मिश्रा नाम के एक शख्स ने लिखा, ‘लोकसभा चुनाव में प्रयागराज लोकसभा के प्रबल दावेदार भी थे. टिकट नहीं मिला था. इनके एक भाई अमेरिका में संघ का काम देखते है. अच्छा बैकग्राउंड हैं.’

राधाकांत ओझा कितने बड़े वकील?

बीते कई सालों से राधाकांत ओझा की गिनती प्रयागराज के वरिष्ठ अधिवक्ताओं में होती रही है. बीजेपी ने यूपी चुनाव 2027 को देखते हुए राजनीति के मैदान से निकलकर कोर्ट-कचहरी की राजनीति के अनुभवी चेहरे को संसद का रास्ता दिखाया है. लेकिन सवाल यह है कि जिस व्यक्ति को 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के चुनाव में तीसरे स्थान पर रहना पड़ा, उसी पर बीजेपी ने इतना बड़ा भरोसा क्यों जताया?
बीजेपी के राज्यसभा उम्मीदवार राधाकांत ओझा का राजनीतिक जीवन.

राधाकांत ओझा का मजबूत पक्ष

राजनीतिक विश्लेषक इसका जवाब सिर्फ चुनावी आंकड़ों में नहीं, बल्कि ओझा के करीब चार दशक लंबे कानूनी करियर, संगठन से रिश्ते और प्रयागराज और प्रतापगढ़ क्षेत्र की सामाजिक-राजनीतिक बैकग्राउंड में छिपा देखते हैं. राधाकांत ओझा इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के दो बार अध्यक्ष रह चुके हैं. उन्होंने पहली बार 2015 में अध्यक्ष पद का चुनाव जीता था और दिसंबर 2021 में दोबारा अध्यक्ष बने. लेकिन 2026 के बार चुनाव में तीसरी बार अध्यक्ष बनने की कोशिश में उन्हें तीसरे स्थान पर संतोष करना पड़ा.

राधाकंत ओझा ने कब शुरू की वकालत

राधाकांत ओझा ने 1987 से इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत शुरू की. 2013 में उन्हें वरिष्ठ अधिवक्ता के रूप में नामित किया गया. संवैधानिक, सिविल, आपराधिक और सेवा मामलों में उनकी विशेषज्ञता बताई जाती है. बार एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में भी उन्होंने अधिवक्ताओं के बीच लंबा समय बिताया है. यानी उनका सबसे बड़ा राजनीतिक संसाधन पारंपरिक चुनावी संगठन नहीं, बल्कि कानूनी और पेशेवर नेटवर्क है.

संघ और बीजेपी से कितना पुराना रिश्ता?

राधाकांत ओझा की प्रोफाइल बीजेपी के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है. वह पार्टी और आरएसएस के साथ सामाजिक-सांगठनिक गतिविधियों से जुड़े रहे. उनका संबंध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद से रहा है. वह आरएसएस से जुड़े दायित्वों में भी सक्रिय रहे और भाजपा के काशी क्षेत्र में कानून से जुड़े महमत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. उम्मीदवार घोषित होने के बाद भी उनका पहला कदम ध्यान सबों का ध्यान खींचा. वह प्रयागराज में आरएसएस कार्यालय पहुंचे और उसके बाद बीजेपी कार्यालय गए. यानी बीजेपी के लिए ओझा सिर्फ वकील नहीं बल्कि संगठन से लंबे समय से जुड़े कानूनी चेहरे हैं.

राधाकांत ओझा का परिवार राजनीतिक रूप से कितना प्रभावशाली?

राधाकांत ओझा का फैमिली बैकग्राउंड क्या है?

राधाकांत ओझा का परिवार भी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली रहा है. उनके पिता रमाशंकर ओझा शिक्षाविद थे और कॉलेज प्रींसिपल पद से रिटायर्ड हुए. राधाकांत चार भाइयों में तीसरे नंबर पर हैं. उनके बड़े भाई प्रो. शिवाकांत ओझा उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय रहे, विधायक रहे और समाजवादी पार्टी सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रह चुके हैं. दूसरे भाई निशाकांत ओझा कॉलेज के प्राचार्य पद से रिटायर हुए. राधाकांत ओझा प्रतापगढ़ के रानीगंज क्षेत्र के रहन वाले हैं. लंबे समय से वह प्रयागराज रह रहे हैं.

केशरीनाथ त्रिपाठी से भी रहा है पुराना जुड़ाव

ओझा को करीब से जानने वाले एक वकील अमरेश तिवारी कहते हैं, ‘राधाकांत ओझा की राजनीतिक-सामाजिक यात्रा में बीजेपी के वरिष्ठ नेता केशरीनाथ त्रिपाठी का भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है.’ ओझा के मुताबिक उनकी त्रिपाठी से पहली मुलाकात 1977 में हुई थी, जब त्रिपाठी फूलपुर से विधानसभा चुनाव लड़ रहे थे. उस समय ओझा छात्र थे और उनके पिता कॉलेज के प्रधानाचार्य थे. बाद में हाईकोर्ट में वकालत के दौरान भी दोनों का संपर्क बना रहा.

राधाकांत की कमजोरी क्या है?

राधाकांत ओझा की सबसे स्पष्ट कमजोरी यही है कि उनकी प्रत्यक्ष चुनावी राजनीति का अनुभव सीमित है. वह विधानसभा या लोकसभा चुनाव जीतकर आए नेता नहीं हैं. 2024 के फूलपुर विधानसभा चुनाव के समय बीजेपी उम्मीदवार के तौर पर उनका नाम चर्चा में जरूर आया था, लेकिन उन्हें विधानसभा टिकट नहीं मिला. राज्यसभा सांसद बनने के बाद उन्हें सिर्फ कानूनी मुद्दों तक सीमित रहने के बजाय बीजेपी यूपी चुनाव 2027 में भी उतार कर ब्राह्मण वोट बैंक को साध सकती है.

बीजेपी आलाकमान ने यूपी चुनाव 2027 से पहले एक ऐसे चेहरे पर दांव खेला है, जो जो कानून, संगठन और पूर्वांचल तीनों को जोड़ सकता है. यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले बीजेपी ने राज्यसभा के लिए आठों सीटों पर नए चेहरे उतारे हैं. सूची में 3 ओबीसी, 2 दलित, 2 ब्राह्मण और 1 ठाकुर चेहरा है. राधाकांत ओझा और गोपी कृष्ण पांडेय ब्राह्मण चेहरे हैं. इसलिए ओझा की नियुक्ति कर बीजेपी ने ब्राह्मण वोट बैंक को अपने पाले में करने का बड़ा दांव खेला है.



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