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अयोध्या में मोहर्रम के मौके पर शिया समुदाय ने सदियों पुरानी परंपरा निभाते हुए सरयू नदी में ताजिया प्रवाहित किया. यह अनूठी परंपरा गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल पेश करती है, जहां धार्मिक एकता और भाईचारा स्पष्ट रूप से…और पढ़ें
हाइलाइट्स
- अयोध्या में सरयू में प्रवाहित किया जाता है ताजिया
- हिंदू-मुस्लिम आस्था का साझा प्रतीक
- अयोध्या में है ये अनूठी परंपरा
हिंदू-मुस्लिम आस्था का साझा प्रतीक
सरयू नदी हिंदू धर्म में जितनी पवित्र मानी जाती है, उतनी ही श्रद्धा से शिया समुदाय भी इसे देखता है. उनका मानना है कि यह नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि आत्मा को शुद्ध करने वाली पवित्र शक्ति है. अयोध्या में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसमें मोहर्रम के दसवें दिन ताजिए को सरयू में प्रवाहित किया जाता है.
मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना होता है और इसकी दसवीं तारीख को कर्बला में हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद किया जाता है. अयोध्या में भी शिया समुदाय ने भारी संख्या में इकट्ठा होकर ‘या हुसैन’ की सदा के साथ ताजिए का जुलूस निकाला. फिर सरयू नदी तट पर जाकर ‘अलविदा या हुसैन’ कहते हुए ताजिए को श्रद्धापूर्वक जल में प्रवाहित किया गया.
नसीम हैदर रिजवी ने दी जानकारी
कार्यक्रम में शामिल नसीम हैदर रिज़वी ने बताया कि यह परंपरा बहुत पुरानी है, हम लोग हर साल हजरत इमाम हुसैन की याद में ताजिए को सरयू में प्रवाहित करते हैं. यह दिन हमारे लिए गम और इबादत का दिन होता है. सरयू को हम बेहद पवित्र मानते हैं और यह परंपरा हमारी तहजीब का हिस्सा है.
अयोध्या में ही क्यों अनूठी है यह परंपरा?
भारत में मोहर्रम के मौके पर ताजिए का विसर्जन आम है, लेकिन किसी पवित्र नदी में इस तरह का ‘सुपुर्द-ए-दरिया’ केवल अयोध्या में ही देखने को मिलता है. यही अयोध्या की पहचान है जहां राम और हुसैन दोनों की आस्था को एक साथ सम्मान मिलता है.


