किसान पिता जगदीश पटेल से अपनी फूल जैसी बेटियों का यह संघर्ष और पैरों के छाले देखे नहीं गए। गांव में साधन नहीं थे, जेब में इतना पैसा नहीं था कि शहर में कमरा दिला सकें, पर सीने में एक जिद्दी पिता का कलेजा जरूर धड़क रहा था।
फिल्म दंगल तो आपको याद ही होगी किस तरह एक पिता अपनी बेटियों के लिए दंगल का मैदान तैयार करता है और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर एक नई पहचान दिलाता है। इस तरह मध्य प्रदेश के खंडवा की भी एक सच्ची कहानी है । जहां एक पिता ने खेल मैदान अपने घर से 10 किलोमीटर दूर होने की वजह से अपनी दो बेटियों को अपने घर के बाड़े (गौशाला) में ही खेल का मैदान बना कर दे दिया। आज यह बेटियां न सिर्फ स्टेट और नेशनल लेवल पर गांव का परचम लहर लहरा रही है बल्कि अपने माता-पिता का नाम भी रोशन कर रही है । ये कहानी है रियल लाइफ के आमिर खान यानी जगदीश पटेल और वॉलीबॉल गर्ल श्रद्धा और ऋषिका की।
खंडवा की वॉलीबॉल गर्ल
खंडवा की कच्ची पक्की सड़कों पर दो बेटियां साइकिल के पैडल मारते 10 किलो मीटर का थका देने वाला सफर करते नजर आती थी। दोनों बहनों श्रद्धा और ऋषिका के हाथ में सिर्फ खेलने के लिए बॉल ही नहीं, बल्कि आंखों में वॉलीबॉल की ऊंची उड़ान के सपने लदे होते थे। रोजाना शहर के खेल मैदान तक पहुंचने के लिए 10 किलोमीटर की धूल भरी, थका देने वाली दूरी तय करना उनकी दिनचर्या बन चुकी थी। शाम को जब दोनों घर लौटतीं, तो उनके चेहरों पर पसीने की धार और आंखों में बेइंतहा थकान तैर रही होती थी।
पिता ने तबेले को बना दिया खेल मैदान
किसान पिता जगदीश पटेल से अपनी फूल जैसी बेटियों का यह संघर्ष और पैरों के छाले देखे नहीं गए। गांव में साधन नहीं थे, जेब में इतना पैसा नहीं था कि शहर में कमरा दिला सकें, पर सीने में एक जिद्दी पिता का कलेजा जरूर धड़क रहा था। एक शाम बेटियों की थकी हुई सांसों को देखकर जगदीश ने चुपचाप फावड़ा उठाया। उन्होंने घर के पिछले हिस्से में गाय-बैलों के बाड़े की ओर रुख किया। जहां मवेशी बंधते थे और गोबर की सोंधी महक फैली रहती थी, उसी जमीन को पिता ने अपने हाथों से समतल करना शुरू कर दिया।
खुरदुरी हथेलियों से पत्थर हटाए गए, और वॉलीबॉल का एक साधारण सा टूटी फूटी नेट तान दी। समाज के तानों और संसाधनों के अभाव को परे धकेलकर उस तबेले में एक पिता ने अपनी बेटियों के लिए उम्मीदों का आसमान सजा दिया। अब न 10 किलोमीटर का थका देने वाला सफर था, न किसी बात की बंदिश। भोर के धुंधलके से लेकर ढलती शाम तक, उसी बाड़े की मिट्टी में दो बहनों का पसीना टपकने लगा।
बेटियों ने लगराया परचम
मेहनत और पिता के भरोसे का रंग आखिरकार चढ़ा। बाड़े की उसी मिट्टी से उड़ान भरकर बड़ी बेटी श्रद्धा नेशनल स्तर पर जा पहुंची और छोटी ऋषिका ने स्टेट लेवल पर अपना परचम लहरा दिया। आज जब वे दोनों गेंद पर पूरी ताकत से हाथ मारती हैं, तो उसमें सिर्फ खेल की तकनीक नहीं, बल्कि अपने पिता के त्याग और तपस्या की गूंज सुनाई देती है।
अब वह साधारण सा बाड़ा सिर्फ दो बहनों की प्रैक्टिस का ठिकाना नहीं रहा, बल्कि पूरे गांव के सपनों की नर्सरी बन चुका है। श्रद्धा और ऋषिका गांव के बाकी बच्चों को भी उसी आंगन में खेल के गुर सिखा रही हैं। एक पिता के शांत संकल्प ने न केवल अपनी बेटियों की तकदीर बदली, बल्कि एक पूरे गांव को खेल के जुनून और नई उम्मीद से भर दिया।
रिपोर्ट : निशात मोहम्मद सिद्दीकी



