
संवाददाता। राजन जायसवाल।
कोन / सोनभद्र – जनपद सोनभद्र के विकास खंड कोन अंतर्गत ग्राम पंचायत खेमपुर में सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी को लेकर गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं। यह मामला न सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही, बल्कि सूचना छिपाने और संभावित वित्तीय अनियमितताओं की ओर भी संकेत करता है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, आवेदक राजेश कुमार जायसवाल ने वर्ष 2021-22 से 2024-25 तक ग्राम पंचायत के खर्च, खरीद, भुगतान और संबंधित अभिलेखों की जानकारी मांगी थी। नियमानुसार 30 दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध कराई जानी चाहिए थी, लेकिन निर्धारित समय सीमा में कोई जवाब नहीं दिया गया।
करीब 35 दिन बाद संबंधित विभाग द्वारा आवेदक से ₹8500 का नकल शुल्क मांगा गया। हैरानी की बात यह रही कि इस शुल्क के निर्धारण का कोई स्पष्ट आधार नहीं बताया गया और न ही कुल पृष्ठों की संख्या की जानकारी दी गई। यदि ₹2 प्रति पृष्ठ के मानक के अनुसार गणना की जाए, तो ₹8500 के एवज में लगभग 4250 पृष्ठों की जानकारी दी जानी चाहिए थी।
डीपीआरओ सोनभद्र के हस्तक्षेप के बाद आवेदक को मात्र 646 पृष्ठ ही उपलब्ध कराए गए। इनमें भी कई दस्तावेज धुंधले, अपठनीय और अधूरे पाए गए। इस प्रकार लगभग 3600 से अधिक पृष्ठों की जानकारी गायब होने से पूरे मामले पर संदेह गहरा गया है। इस प्रकरण में जिला पंचायत राज अधिकारी ने स्वयं माना कि मांगा गया शुल्क नियमों के विरुद्ध था। उन्होंने आदेश जारी कर निर्देश दिया कि आवेदक को बिना किसी शुल्क के 3 दिनों के भीतर पूर्ण जानकारी उपलब्ध कराई जाए। साथ ही चेतावनी दी कि आदेश का पालन न करने पर ₹250 प्रतिदिन (अधिकतम ₹25,000) का जुर्माना लगाया जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं—
आखिर ₹8500 का शुल्क किस आधार पर तय किया गया?
जब शुल्क के अनुसार हजारों पृष्ठ बनने चाहिए थे, तो केवल 646 पृष्ठ ही क्यों दिए गए?
क्या शेष दस्तावेज जानबूझकर छिपाए जा रहे हैं? क्या यह किसी बड़े वित्तीय अनियमितता या घोटाले को दबाने की कोशिश है? यह मामला केवल एक ग्राम पंचायत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है, जहां पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाला RTI कानून भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रहा है। स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पूरे मामले की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कराने, संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय करने, अवैध रूप से मांगे गए शुल्क की जांच करने और सभी अभिलेखों को सार्वजनिक करने की मांग की है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में सख्त कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी केवल विभागीय खानापूर्ति बनकर रह जाता है। वहीं, आम जनता अब इस मुद्दे पर मुखर हो चुकी है और पारदर्शिता की मांग लगातार तेज होती जा रही है।