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Historical Places in Rampur: रामपुर को अक्सर नवाबों की रियासत के तौर पर जाना जाता है, लेकिन यहां की पहचान सिर्फ शाही महलों तक सीमित नहीं है. जिले में ऐसी कई ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरें हैं, जिनसे जुड़ी कहानियां आज भी लोगों को अपनी ओर खींचती हैं. कहीं नवाबी दौर की भव्य वास्तुकला है तो कहीं सदियों पुरानी आस्था और संस्कृति की झलक मिलती है. रजा लाइब्रेरी की दुर्लभ पांडुलिपियों से लेकर ऐतिहासिक महलों, पुराने रेलवे स्टेशन और प्राचीन मंदिर तक रामपुर में घूमने के लिए कई खास जगहें हैं. जानिए रामपुर की उन धरोहरों के बारे में, जो जिले के इतिहास और पहचान को आज भी जिंदा रखे हुए हैं.
रामपुर का नाम सुनते ही अक्सर नवाबों और उनकी शाही जिंदगी की तस्वीर सामने आती है लेकिन इस जिले की पहचान इससे कहीं बड़ी है. यहां ऐसी ऐतिहासिक इमारतें धार्मिक स्थल और धरोहरें मौजूद हैं जो रामपुर के पुराने दौर से लेकर आधुनिक पहचान तक की कहानी बताती हैं. कहीं नवाबी महलों की भव्यता दिखती है तो कहीं सदियों पुरानी आस्था से जुड़े मंदिर हैं. रजा लाइब्रेरी की दुर्लभ पांडुलिपियां और गांधी समाधि जैसी धरोहरें भी रामपुर को खास बनाती हैं. आइए जानते हैं जिले की ऐसी ही खास जगहों के बारे में.
रामपुर का खासबाग पैलेस नवाबी दौर की शान और शानदार वास्तुकला की पहचान है. करीब 55 एकड़ में फैले इस महल में 205 कमरे बताए जाते हैं. इसकी बनावट में मुगल, इस्लामिक और यूरोपीय शैली का मेल देखने को मिलता है. महल में इटालियन संगमरमर, बेल्जियम के झूमर और म्यांमार की सागौन लकड़ी का इस्तेमाल हुआ था. यहां नवाबों के लिए सिनेमा हॉल, म्यूजिक रूम और बॉलरूम भी बनाए गए थे. उन्नीसवीं सदी में शुरू हुआ इसका निर्माण 1930 में पूरा हुआ और यह उस दौर का पहला एशिया का पहला वातानुकूलित महल है.
लक्खीबाग की खास बात यह है कि इसका नाम ही इसके इतिहास से जुड़ा है. बताया जाता है कि करीब 135 से 140 साल पहले रामपुर के नवाबों ने यहां एक लाख आम के पेड़ लगवाए थे इसलिए इसे लक्खीबाग कहा जाने लगा. शाहबाद क्षेत्र में फैला यह ऐतिहासिक परिसर करीब 230.65 एकड़ में है. इसमें भीतर गांव और मंगोली का रकबा भी शामिल है. इतिहासकार इंडियन नेशनल ट्रस्ट फ़ॉर आर्ट एंड कल्चर हेरिटेज (इंटेक) रुहेलखंड चेप्टर के सह संयोजक काशिफ खान के मुताबिक रामपुर रियासत के पहले नवाब फैजुल्ला खां भी अपनी टीम के साथ इसी क्षेत्र में आए थे.
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रामपुर की बेनजीर कोठी कभी नवाबों के गर्मियों के निवास और खास मेहमानों की मेजबानी के लिए इस्तेमाल होती थी. इसकी बनावट में मुगल और यूरोपीय वास्तुकला की झलक दिखाई देती है. मेहराब, गुंबद और विशाल बाग इसकी खास पहचान रहे हैं। परिसर में कदम ए रसूल भी स्थित है जिसका धार्मिक महत्व बताया जाता है. यहां कभी संगीत की महफिलें और सांस्कृतिक आयोजन हुआ करते थे. आज यह ऐतिहासिक इमारत जर्जर हालत में है.
रामपुर की गांधी समाधि शहर की ऐतिहासिक पहचान में चार चांद लगाती है. यहां शाम के समय लोग घूमने और शांत माहौल में समय बिताने पहुंचते हैं. खास बात यह है कि दिल्ली के राजघाट के अलावा रामपुर भी उन चुनिंदा शहरों में है जहां महात्मा गांधी की अस्थियों का एक हिस्सा सहेजकर रखा गया है. यही वजह है कि गांधी समाधि रामपुर की ऐतिहासिक और पर्यटन पहचान का खास हिस्सा बन गई है.
रामपुर की रजा लाइब्रेरी देश ही नहीं दुनिया में अपनी दुर्लभ पांडुलिपियों के लिए पहचानी जाती है. यहां करीब 17 हजार पांडुलिपियां और सातवीं से उन्नीसवीं शताब्दी तक की सैकड़ों कुरान की प्रतियां मौजूद हैं. इनमें कई प्रतियां सोने के पानी से लिखी और सजाई गई हैं. ऊंट की खाल पर कूफी लिपि में लिखी सातवीं सदी की कुरान यहां की खास धरोहरों में गिनी जाती है. लाइब्रेरी में रखी किताबें, कलाकृतियां और ऐतिहासिक दस्तावेज रामपुर की साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाते हैं.
रामपुर का नवाब रेलवे स्टेशन भारतीय रेल इतिहास की एक अनोखी कहानी समेटे हुए है. बताया जाता है कि नवाब हामिद अली खान ने अपनी रियासत के लिए रामपुर से मिलक तक करीब 40 किलोमीटर लंबी निजी रेल लाइन बनवाई थी. इस रेल व्यवस्था का इस्तेमाल नवाबी परिवार करता था. विभाजन के दौर में नवाब रजा अली खान ने परिवारों की यात्रा के लिए भी इसका उपयोग किया था. वर्ष 1954 में दो शाही सैलून कोच भारतीय रेलवे को सौंपे गए. आज देखरेख के अभाव में यह स्टेशन बंद पड़ा है.
रामपुर मुख्यालय से करीब 8 से 10 किलोमीटर दूर भमरौआ का पातालेश्वर महादेव मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है. यहां स्थापित स्वयंभू शिवलिंग के दर्शन के लिए दूर दूर से भक्त पहुंचते हैं. स्थानीय मान्यता है कि पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान इस स्थान पर भगवान शिव की पूजा की थी. सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि पर मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. कांवड़िये भी यहां जलाभिषेक करते हैं. धार्मिक मान्यताओं और विशाल मेलों के कारण इस मंदिर की रामपुर में खास पहचान है.



