1940 के दशक में फिल्मी पर्दे पर कई खूबसूरत और मंझी हुई अदाकाराओं ने राज किया. मीना कुमारी, बेगम पारा, मधुबाला और नरगिस जैसी एक्ट्रेस उस समय पर्दे पर छाई हुई थीं, पर एक अदाकारा ऐसी भी थी जो सिर्फ पर्दे पर ही नहीं बल्कि पर्दे के पीछे से भी अपनी सुरीली आवाज से फैंस का दिल जीत रही थी.
सुरैया को पहला ब्रेक
सुरैया का परिवार लाहौर से मुंबई शिफ्ट हो गया था, जहाँ उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई की. फिल्मी दुनिया में कदम रखना उनके लिए आसान था क्योंकि उनके मामा एम. जहूर पहले से ही हिंदी सिनेमा में एक्टिव थे और विलेन के रूप में पहचान बना चुके थे. लेकिन सुरैया को पहला ब्रेक अदाकारा के तौर पर नहीं बल्कि सिंगर के तौर पर मिला.
गाने से की शुरुआत
वह बचपन में ऑल इंडिया रेडियो पर गाती थीं, और उनकी आवाज को प्रसिद्ध संगीतकार नौशाद साहब ने सुना. नौशाद साहब ने छोटी सी उम्र में ही सुरैया को फिल्म “शारदा” में गाने का मौका दिया, जिसमें उन्होंने “नई दुनिया” नाम का गाना गाया.
तब मिली मोटी रकम
सुरैया ने निर्देशक के. आसिफ के साथ बतौर एक्ट्रेस पर्दे पर कदम रखा. इस फिल्म के लिए उन्हें 40 हजार रुपये मिले थे. इसके बाद उन्होंने ‘प्यार की जीत’, ‘अनमोल घड़ी’, ‘परवाना’, ‘उमर खय्याम’, और ‘दर्द’ जैसी फिल्मों में काम किया और बड़ी उपलब्धि हासिल की. माना जाता है कि बतौर एक्ट्रेस उन्हें के एल सहगल का बहुत साथ मिला. दोनों ने साथ में कई फिल्में कीं, और सहगल की सिफारिशों के बाद सुरैया को और भी फिल्में और कामयाबी मिलने लगी.
खूबसूरती ही बनी श्राप
1950 के दशक में सुरैया फिल्म इंडस्ट्री का बड़ा नाम बन गईं और उनकी पॉपुलैरिटी और खूबसूरती उनके लिए श्राप बन गई. उनकी एक झलक पाने के लिए फैंस की भीड़ घर के बाहर और सिनेमाघरों के बाहर इंतजार करती थी. सुरैया को छिपकर घर से निकलना पड़ता था और पुलिस की सुरक्षा लेनी पड़ती थी. एक बार एक फैन उनसे शादी करने के लिए बारात लेकर उनके घर पहुंचा और मुंहदिखाई में 2 लाख के गहने भी लाया.
पुलिस का सहारा लेना पड़ा
उस दीवाने फैन को घर के आगे से हटाने के लिए पुलिस का सहारा लेना पड़ा. फैंस की बढ़ती भीड़ की वजह से एक्ट्रेस ने फिल्मों के प्रीमियर तक पर जाना छोड़ दिया था. एक्टर-डायरेक्टर सभी चाहते थे कि वह फिल्म के प्रीमियर में आएं, लेकिन हालात ऐसे बन जाते कि कई बार प्रीमियर कैंसिल करना पड़ जाता.



