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जौनपुर की गलियों में एक ऐसा स्वाद है, जिसने राजाओं को भी अपना दीवाना बनाया – जगदम्बा पान. चार पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को आज विशाल चौरसिया संभाल रहे हैं, जिन्होंने पढ़ाई-लिखाई छोड़कर अपने पुश्तैनी काम को ही आगे बढ़ाना चुना. हर पान में बुजुर्गों की कला और भरोसे की खुशबू है, और यही वजह है कि लोग इसे आज भी “राजा वाला पान” कहकर याद करते हैं. यह सिर्फ पान नहीं, जौनपुर की एक ज़िंदा विरासत है.
जौनपुर. उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक शहर जौनपुर की पहचान सिर्फ अपनी इमारतों और सांस्कृतिक विरासत से ही नहीं, बल्कि यहां के खास स्वादों से भी है. इन्हीं में से एक है “जगदम्बा पान”, जिसकी खुशबू और स्वाद ने वर्षों से लोगों को अपना दीवाना बना रखा है. खास बात यह है कि इस पान के दीवानों में जौनपुर के राजा यादवेंद्र दुबे भी शामिल रहे हैं, जिन्हें यह पान बेहद पसंद था. जगदम्बा पान की दुकान की कहानी केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक परंपरा है. आज इस दुकान को संभाल रहे विशाल चौरसिया बताते हैं कि यह उनके परिवार की चौथी पीढ़ी है, जो इस विरासत को आगे बढ़ा रही है. उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने जो स्वाद और भरोसा लोगों को दिया, उसी को बनाए रखना हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है.
विशाल चौरसिया खुद पढ़े-लिखे युवा हैं, उन्होंने एलएलबी की पढ़ाई की है, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने पुश्तैनी काम को ही आगे बढ़ाने का निर्णय लिया. उनका मानना है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, अगर उसे लगन और ईमानदारी से किया जाए. वे गर्व से कहते हैं कि पान बनाना सिर्फ एक काम नहीं, बल्कि एक कला है, जिसे हमने अपने बुजुर्गों से सीखा है.
जगदम्बा पान की खासियत उसकी पारंपरिक विधि और बेहतरीन सामग्री
यहां पान बनाने में गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिससे हर ग्राहक को वही पुराना और असली स्वाद मिल सके. यही कारण है कि वर्षों बाद भी इस पान की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई है. स्थानीय लोग ही नहीं, बल्कि दूर-दराज से आने वाले लोग भी इस पान का स्वाद लेने जरूर पहुंचते हैं. राजा यादवेंद्र दुबे के समय से ही इस पान की प्रतिष्ठा और भी बढ़ गई थी. कहा जाता है कि राजा साहब को इस दुकान का पान इतना पसंद था कि वह विशेष रूप से यहीं से पान मंगवाते थे. यही वजह है कि आज भी लोग इस पान को “राजा वाला पान” कहकर पहचानते हैं. आज के दौर में जहां युवा नई-नई नौकरियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं, वहीं विशाल चौरसिया जैसे लोग अपनी परंपरा को संजोकर एक मिसाल पेश कर रहे हैं. उन्होंने यह साबित कर दिया है कि अगर मेहनत और लगन हो, तो पुश्तैनी काम भी आपको पहचान और सम्मान दिला सकता है.
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नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें



