मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को हराकर अहम जीत दर्ज की। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार नारोत्तम मिश्रा का टिकट कटना, स्थानीय संगठन में असंतोष, ग्रामीण मतदान, स्थानीय मुद्दे और महिला वोटिंग पैटर्न समेत कई फैक्टर इस चुनाव में गेमचेंजर साबित हुए।
मध्य प्रदेश की दतिया विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस के कुँवर घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को हराकर अहम जीत दर्ज की। यह उपचुनाव भले ही एक सीट का था, लेकिन इसे प्रदेश भाजपा के नए नेतृत्व की पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा था। दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए यह जीत ऐसे समय आई है, जब चुनाव से ठीक पहले पार्टी के भीतर भी असंतोष और गुटबाजी की खबरें सामने आई थीं।
दतिया उपचुनाव राजेंद्र भारती की विधायकी रद्द होने के बाद कराया गया था। कांग्रेस ने कुँवर घनश्याम सिंह को मैदान में उतारा, जबकि भाजपा ने आशुतोष तिवारी पर दांव चला था। चुनाव परिणाम आने के बाद राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इस बात पर चर्चा तेज हो गई कि आखिर किन कारणों से भाजपा यह सीट नहीं बचा सकी और कांग्रेस ने बाजी मार ली। आइए जानते हैं ऐसे पांच बड़े फैक्टर, जिन्हें इस चुनाव का गेमचेंजर माना जा रहा है।
1- नारोत्तम मिश्रा का टिकट कटना और आंसू पड़े भारी?
इस चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा पूर्व गृह मंत्री और छह बार के विधायक रहे नारोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं मिलने की रही। माना जा रहा है कि भाजपा के इस फैसले से उनके समर्थकों में नाराजगी पैदा हुई। टिकट कटने के बाद पार्टी के भीतर विरोध भी देखने को मिला।
हालांकि बाद में नारोत्तम मिश्रा ने भाजपा प्रत्याशी के लिए प्रचार किया, लेकिन राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनके समर्थकों का पूरा वोट और संगठनात्मक समर्थन नए उम्मीदवार तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाया। क्योंकि प्रचार के दौरान नरोत्तम मिश्रा स्टेज पर भावुक हो गए थे कि उनके आंसू तक छलक आए। संभावना है कि उनके सपोर्टर ने इसका बदला लिया हो।
2- संगठन के भीतर असंतोष का असर?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टिकट बांटने के बाद भाजपा के स्थानीय संगठन में असंतोष पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया था। बूथ स्तर तक कुछ कार्यकर्ताओं की नाराजगी की चर्चा लगातार बनी रही। माना जा रहा है कि इसका असर चुनावी प्रबंधन और मतदान के दिन कार्यकर्ताओं की सक्रियता पर भी पड़ा हो सकता है।
3. स्थानीय मुद्दों पर कांग्रेस का फोकस
कांग्रेस ने इस चुनाव में बड़े राजनीतिक मुद्दों की बजाय स्थानीय समस्याओं को प्रमुखता दी। किसानों की परेशानी, जब-तब हो जाने वाली बारिश, खाद की उपलब्धता और युवाओं में बेरोजगारी जैसे मुद्दों को लगातार उठाया गया। माना जा रहा है कि ग्रामीण इलाकों में इन मुद्दों का असर देखने को मिला और कांग्रेस को इसका फायदा मिला।
4. महिला वोटरों और ग्रामीण इलाकों का रोल
भाजपा को उम्मीद थी कि उसकी कल्याणकारी योजनाओं का असर महिला मतदाताओं पर दिखाई देगा। हालांकि मतदान के आंकड़ों में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के मुकाबले कम रही। ऐसे में कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा को जिस स्तर पर महिला वोटों से लाभ मिलने की उम्मीद थी, वैसा परिणाम नहीं मिला।
मतदान के आंकड़ों पर नजर डालें तो ग्रामीण क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत शहरी इलाकों की तुलना में काफी अधिक रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ग्रामीण मतदान में बढ़ोतरी का लाभ कांग्रेस को मिला हो सकता है, क्योंकि पार्टी ने अपना प्रचार भी गांवों और किसानों से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित रखा था।
5. कांग्रेस में गुटबाजी के बावजूद वोटों का बंटवारा नहीं हुआ
चुनाव से पहले कांग्रेस भी पूरी तरह एकजुट नजर नहीं आ रही थी। पूर्व विधायक राजेंद्र भारती को मतदान से ठीक पहले पार्टी ने निलंबित कर दिया था और टिकट वितरण को लेकर भी असंतोष की खबरें थीं। इसके बावजूद माना जा रहा है कि मतदान के समय कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक काफी हद तक एकजुट रहा और इसका लाभ पार्टी को मिला।
भाजपा के लिए प्रतिष्ठा का चुनाव बन गया
मुख्यमंत्री मोहन यादव, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल समेत कई वरिष्ठ नेताओं ने दतिया में व्यापक प्रचार किया। भाजपा ने इस उपचुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल बनाकर पूरी ताकत झोंक दी। इसके बावजूद जीत नहीं मिलना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय है। विश्लेषकों का मानना है कि इस परिणाम को प्रदेश भाजपा के लिए एक संगठनात्मक संकेत के तौर पर भी देखा जा सकता है।
हालांकि चुनावी नतीजों के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। मतदाताओं का फैसला कई स्थानीय, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों से मिलकर बनता है। ऐसे में दतिया उपचुनाव का परिणाम भी कई कारकों के संयुक्त प्रभाव का नतीजा माना जा रहा है।



