यूपी के 25 हजार अनुदेशकों के लिए अच्छी खबर है। इन 25 हजार अनुदेशकों को 2017 से ही बढ़ा हुआ मानदेय मिलेगा। उत्तर प्रदेश सरकार को गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है।
जूनियर हाई स्कूलों में पिछले एक दशक से भी अधिक समय से महज 7 हजार रुपये के मासिक मानदेय पर कार्यरत 25 हजार अनुदेशकों के वेतन बढ़ोतरी के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश सरकार को गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने 4 फरवरी के अपने उस फैसले की समीक्षा करने से इनकार कर दिया, राज्य के जूनियर हाई स्कूलों में पिछले एक दशक से भी अधिक समय से महज 7 हजार रुपये के मासिक मानदेय पर कार्यरत अनुदेशकों को मानदेय बढ़ा दिया था। शीर्ष अदालत ने उक्त फैसले में यह भी कहा था कि अनुबंध पर कार्यरत ये अनुदेशक वर्ष 2017-18 से ही 17 हजार रुपये मासिक वेतन पाने का हकदार है और अनुबंध खत्म होने के बाद उनकी नियुक्ति स्थाई माना जाएगा।
जस्टिस विक्रम नाथ और पीबी वराले की पीठ ने इस फैसले की समीक्षा की मांग को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से दाखिल पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने एक पन्ने के अपने आदेश में कहा कि ‘4 फरवरी, 2026 को पारित फैसले में किसी तरह की कोई खामी नहीं है।’ उक्त फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘एक दशक से भी अधिक समय से इन अनुबंधित अनुदेशकों को महज 7 हजार रुपये के मासिक मानदेय पर रखना न सिर्फ अनुचित प्रथा है जो बंधुआ मजदूरी/बेगार के सामन है और यह संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत यह पूरी तरह से प्रतिबंधित है।’
पीठ ने इन अनुदेशकों को वित्तीय वर्ष 2017-18 से 17 हजार रुपये मासिक के हिसाब से वेतन देने का आदेश दिया था और पिछला बकाया छह माह के भीतर भुगतान करने को कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की अपील को खारिज करते हुए ये फैसला दिया था।
पीठ ने यूपी सरकार को आदेश दिया है कि वह 1 अप्रैल, 2026 से सभी इस श्रेणी के सभी अनुदेशकों को 17,000 रुपये प्रति माह की दर से मानदेय देना शुरू करें और छह माह के भीतर बकाया रकम का भुगतान करें। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पार्ट टाइम या अनुबंध पर रखे गए अनुदेशक की नियुक्ति असल में तब अनुबंध वाली नहीं रह जाती, जब ग्यारह माह के कॉन्ट्रैक्ट अवधि, जिसके लिए उन्हें शुरू में नियुक्त किया गया था, या बढ़ाई गई कॉन्ट्रैक्ट अवधि खत्म हो जाती है।
यूपी सरकार की दलीलों को ठुकराया
पीठ ने कहा था कि असल में ये अनुदेशक जो लगातार दस साल से अधिक समय से काम कर रहे हैं। उन्हें स्थायी पदों पर स्थायी रूप से नियुक्त माना जाएगा क्योंकि समय के साथ और काम की निरंतरता को ध्यान में रखते हुए, ऐसे पद अपने आप बन जाते हैं। कोर्ट ने सरकार की उन दलीलों को सिरे से ठुकरा दिया था, जिसमें कहा गया था कि केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित योजना के लिए केंद्र से पैसा नहीं मिलने के बाद राज्य सरकार को पूरा मानदेय देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है। यूपी सरकार की दलीलों को ठुकराते हुए, शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि इन अनुदेशकों को मानदेय देने की प्रारंभिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की है, जो भुगतान करो और वसूल करो के सिद्धांत पर भारत सरकार से केंद्र सरकार का योगदान वसूल करने के लिए स्वतंत्र है।
अनुदेशकों को पहचानना, महत्व देना और उनका समर्थन करना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि अनुदेशक अपने सबसे महत्वपूर्ण सालों में युवा दिमागों के साथ जुड़ते हैं ओर ऐसा करके वे दृष्टिकोण, आचरण और आदर्शों को गहराई से प्रभावित करते हैं। इसलिए, अगर हम देश के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं, तो हमें उन अनुदेशकों को पहचानना, महत्व देना और उनका समर्थन करना चाहिए जो चुपचाप चरित्र निर्माण, मूल्यों को स्थापित करके और युवाओं का मार्गदर्शन करके देश की नियति को आकार दे रहे हैं।
अनुदेशकों के वेतन को स्थिर नहीं रहने दिया जा सकता
कम से कम हर तीन साल में वेतन बढ़ेगा सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि इन अनुदेशकों के वेतन को स्थिर नहीं रहने दिया जा सकता है। इसे प्रोजेक्ट अप्रूवल बोर्ड (पीएबी) या किसी अन्य प्राधिकार द्वारा, जैसा कि केंद्र सरकार/राज्या सरकार द्वारा योजना या संशोधित योजना के तहत तय किया जा सकता है, कम से कम हर तीन साल में एक बार संशोधित किया जाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने सर्व शिक्षा अभियान के तहत पूरे राज्य में अपर प्राइमरी स्कूलों (कक्षा 6-8) में अनुबंध के आधार पर पार्ट टाइम इंस्ट्रक्टर/टीचर्स को नियुक्त करने का फैसला किया। इसके तहत सरकार ने 2013 में एक विज्ञापन जारी किया गया था जिसमें पार्ट टाइम अनुदेशकों की नियुक्ति के लिए योग्य उम्मीदवारों से आवेदन मांगे गए थे। इसके तहत शिक्षक को 11 माह की अवधि के लिए अनुबंध पर 7,000 रुपये प्रति माह के निश्चित मानदेय पर नियुक्ति हुई।
यूपी सरकार ने अपील दाखिल की थी
नियुक्ति की शर्तों के अनुसार कहा गया कि नियुक्त किए गए अनुदेशक सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से कहीं और कोई पार्ट टाइम या फुल टाइम नौकरी नहीं करेंगे। अनुबंध की अवधि खत्म होने के बाद उनका अनुबंध बढ़ता गया लेकिन उनका मानदेय 7,000 रुपये प्रति माह ही रहा, इसके बावजूद कि उचित अधिकारियों द्वारा इसे बढ़ाने की सिफारिशें की गई थीं। इस ममले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अनुदेशकों की याचिका पर मार्च 2017 से सरकार को 17 हजार रुपये मासिक वेतन देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ यूपी सरकार ने अपील दाखिल की थी।



