सत्यार्थी ने बताया कि ‘अब हमें पारंपरिक राजनीति से ऊपर उठकर ‘करुणामय शासन’ की जरूरत है। इसके बाद उन्होंने करुणा का मतलब बताते हुए कहा कि करुणा का मतलब दूसरों की पीड़ा को अपनी तकलीफ की तरह महसूस करके संवाद करना और निष्पक्ष समाधान निकालना है।’
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) की ओर से आयोजित ‘संसद मार्च’ के एक दिन बाद मंगलवार को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित भारतीय बाल अधिकार कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी ने इस विरोध-प्रदर्शन और उसमें छात्रों के खिलाफ हुए बर्बर बल प्रयोग को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि सोमवार को दिल्ली में हुई घटनाओं से उनका मन दुखी भी है, लेकिन गर्व से भरा हुआ भी है। उन्होंने कहा कि हमारे युवाओं और जेन-जी ने यह साबित कर दिया है कि वे दूसरे देशों के युवाओं से कितने अलग हैं। आगे उन्होंने करुणा का मतलब बताते हुए कहा कि देश को अब करुणामय शासन की जरूरत है। साथ ही सरकार और समाज से अनुरोध करते हुए कहा कि उसे इन बच्चों के साथ तुरंत बातचीत और समाधान का रास्ता निकालना चाहिए।
इस बारे में सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए नोबेल पुरस्कार विजेता सत्यार्थी ने ‘एक्स’ पर लिखा, ‘कल दिल्ली में हुई घटनाओं से मन दुखी भी है और गर्व से भरा भी। हमारे युवाओं और Gen-Z ने साबित कर दिया है कि वे दूसरे देशों के मुकाबले कितने अलग हैं। लाठी और आंसू गैस के बीच भी आक्रोशित युवाओं ने अहिंसक बर्ताव किया और दुख की घड़ी में साहस और संकल्प दिखाया, यही भारत के डीएनए की ताकत है। उन्होंने कहा कि यही बच्चे भारत का भविष्य हैं, जो किसी के बहकावे में प्रदर्शन करने नहीं पहुंचे थे।
सत्यार्थी बोले- अब करुणामय शासन की जरूरत
इसके आगे उन्होंने लिखा कि ‘हमें अब पारंपरिक राजनीति से ऊपर उठकर ‘करुणामय शासन’ की आवश्यकता है। आगे करुणा का मतलब बताते हुए उन्होंने कहा कि करुणा, दया या सहानुभूति नहीं होती, बल्कि वह तो दूसरों की पीड़ा को अपनी तकलीफ की तरह महसूस करके संवाद करना और निष्पक्ष समाधान निकालना होती है।’
सरकार और समाज से की एक बात की अपेक्षा
अपनी पोस्ट के अंत में उन्होंने लिखा, ‘जब मैं दुनिया भर में करुणा के वैश्वीकरण (Globalisation of Compassion) के लिए कार्यरत हूं, तो अपने देश की सरकार और समाज से भी यही अपेक्षा करता हूं कि वे इन बच्चों के साथ तुरंत करुणामय संवाद और समाधान का मार्ग अपनाएं।’
कौन हैं कैलाश सत्यार्थी?
मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में जन्मे कैलाश सत्यार्थी ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ नाम का एक अभियान चलाते हैं। वे पेशे से इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं लेकिन 26 साल की उम्र में ही उन्होंने करियर छोड़कर बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था। उन्होंने 1998 में ‘ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर’ (बाल श्रम के खिलाफ वैश्विक अभियान) की स्थापना की थी और वे अगले कई सालों तक इसके अध्यक्ष भी रहे। यह एक अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क और आंदोलन है। इसकी शुरुआत 103 देशों में 80,000 किलोमीटर लंबे ऐतिहासिक मार्च के साथ हुई थी, जिसने बाल शोषण के सबसे बुरे रूपों पर पूरी तरह रोक लगाने और मुफ्त व अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा को बढ़ावा देने की मांग के लिए लाखों लोगों को एकजुट किया।
कैलाश सत्यार्थी को बच्चों और युवाओं के दमन के खिलाफ जीवन भर सक्रिय रहने और सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार दिलाने के लिए अथक संघर्ष करने के कारण साल 2014 का नोबेल शांति पुरस्कार (मलाला यूसुफजई के साथ संयुक्त रूप से) मिला था।



