नई दिल्ली. म्यूजिक इंडस्ट्री में एआर रहमान एक ऐसा नाम है, जिन्होंने ऑस्कर जीतकर भारत का सिर वैश्विक स्तर पर ऊंचा किया, लेकिन हाल ही में उनके एक इंटरव्यू ने संगीत प्रेमियों को चौंका दिया है. रहमान का कहना है कि पिछले 8 वर्षों से बॉलीवुड में उन्हें काम मिलना कम हो गया है और इसके पीछे की वजह वे ‘सांप्रदायिकता’ को बताते हैं. अब सवाल उठता है कि क्या वाकई उस फिल्म इंडस्ट्री में सांप्रदायिकता हो सकती है, जहां ‘खान’ सरनेम होना सफलता की गारंटी माना जाता है? या फिर यह अपनी व्यावसायिक विफलताओं को छिपाने के लिए ‘मजहबी ढाल’ का उपयोग है? आइए, इसे समझने की कोशिश करते हैं.
एआर रहमान पिछले 30 सालों से बॉलीवुड का हिस्सा हैं. इसी इंडस्ट्री ने उन्हें सिर आंखों पर बिठाया, आइकॉन बनाया और ‘मोजार्ट ऑफ मद्रास’ की उपाधि दी. तीन दशकों तक जिस बॉलीवुड ने उन्हें बेपनाह प्यार दिया, वह अचानक उनके लिए कम्युनल (सांप्रदायिक) कैसे हो गया? दिलचस्प बात यह है कि रहमान को यह ‘दिव्य ज्ञान’ तब मिला जब बॉक्स ऑफिस पर उनके संगीत का जादू पहले जैसा नहीं रहा.
‘छावा’ और गिरती हुई संगीत लोकप्रियता
कलाकार की योग्यता उसके काम से होती है. 90 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों में रहमान ने ‘रोजा’, ‘दिल से’, ‘ताल’ और ‘रंग दे बसंती’ जैसे कालजयी एल्बम दिए, लेकिन क्या आज उनका संगीत उसी स्तर का है? विक्की कौशल स्टारर फिल्म ‘छावा’ बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट रही, लेकिन लगभग हर फिल्म समीक्षक ने माना कि फिल्म का सबसे कमजोर पहलू उसका संगीत था. आज के दौर में प्रीतम, अनिरुद्ध रविचंदर और विशाल मिश्रा जैसे संगीतकार दर्शकों की नब्ज पहचान रहे हैं. संगीत एक गतिशील कला है. अगर रहमान खुद को बदलने में नाकाम रहे हैं, तो इसका दोष समाज या सांप्रदायिकता को देना तर्कसंगत नहीं है.
एआर रहमान के पिछले 10 सालों का सफर उनके वैश्विक संगीत और भारतीय सिनेमा के बीच एक संतुलन रहा है. व्यावसायिक दृष्टिकोण से देखें तो इस दशक में उनके पास ‘2.0’, ‘पोन्नियिन सेलवन (1 & 2)’, और ‘अमर सिंह चमकीला’ जैसी ब्लॉकबस्टर और समीक्षकों द्वारा सराही गई फिल्में रही हैं. हालांकि, इसी दौरान ‘मोहनजोदड़ो’, ‘ओके जानू’, और ‘हीरोपंती 2’ जैसी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरीं, जिन्हें ‘फ्लॉप’ की श्रेणी में रखा गया. रहमान का हालिया स्ट्राइक रेट यह दर्शाता है कि वह अब संख्या के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान दे रहे हैं. जहां ‘अतरंगी रे’ के संगीत ने चार्टबस्टर में जगह बनाई, वहीं कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स फिल्म की कमजोर पटकथा के कारण संगीत के बावजूद अपनी चमक नहीं बिखेर सके. कुल मिलाकर, उनके लिए यह दशक हिट से ज्यादा ‘म्यूजिकल मास्टरपीस’ देने वाला रहा है.
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो एआर रहमान भारत के सबसे अमीर सिंगर और कंपोजर माने जाते हैं. 2026 तक उनकी कुल संपत्ति लगभग 1,728 करोड़ रुपये से 2,100 करोड़ रुपये के बीच आंकी गई है. उनकी आय के मुख्य स्रोत फिल्मों के लिए संगीत निर्देशन, लाइव कॉन्सर्ट, और खुद के वैश्विक म्यूजिक स्टूडियो (चेन्नई, लंदन और लॉस एंजेलिस) हैं. रहमान एक फिल्म के लिए लगभग 8-10 करोड़ रुपये और एक गाने के लिए करीब 3 करोड़ रुपये चार्ज करते हैं. उनके पास चेन्नई और लॉस एंजेलिस में आलीशान बंगले और मर्सिडीज-बेंज, जगुआर और वोल्वो जैसी लग्जरी कारों का शानदार कलेक्शन भी है.
‘खान’ तिकड़ी और बॉलीवुड का असली चेहरा
रहमान के दावों पर सबसे बड़ा प्रहार खुद बॉलीवुड की संरचना करती है. जिस इंडस्ट्री में शाहरुख, सलमान और आमिर खान जैसे सुपरस्टार्स का दशकों से दबदबा हो, जहां जावेद अख्तर, सलीम खान और गुलजार जैसे कलमकारों की पूजा होती हो, उस इंडस्ट्री को सांप्रदायिक कहना न केवल विरोधाभासी है, बल्कि कृतघ्नता जैसा भी लगता है. अगर बॉलीवुड में मजहबी आधार पर भेदभाव होता, तो क्या एक मुस्लिम कलाकार को ‘रामायण’ जैसी महान हिंदू महाकाव्य पर आधारित फिल्म के संगीत के लिए चुना जाता?
जावेद अख्तर का तर्क
वहीं, जावेद अख्तर ने इन तमाम कयासों और विवादों पर अपनी चुप्पी तोड़ते अपने एक इंटरव्यू में कहा, ‘फिल्म इंडस्ट्री में एआर रहमान की शख्सियत इतनी विशाल हो चुकी है कि छोटे निर्माता अक्सर उनसे संपर्क करने में घबराहट महसूस करते हैं. यह कोई ‘सांप्रदायिक दीवार’ नहीं, बल्कि उनकी सफलता का वो ऊंचा शिखर है जिससे लोग हिचकिचाते हैं.’ इससे साफ पता चलता है कि रहमान साहब का कद काफी ऊंचा है, वह इंटरनेशनल लेवल पर अपने काम के लिए जाने जा रहे हैं. ऐसे में, सवाल ये उठता है किया उनके पास वक्त है कि वह बॉलीवुड के लिए भी काम कर पाएं? जावेद सागब ने इंडस्ट्री में रहमान को लेकर चल रही ‘सांप्रदायिक सोच’ की बातों को पूरी तरह सिरे से खारिज कर दिया. साथ में उन्होंने ये भी कहा, ‘रहमान साहब आज जिस मुकाम पर हैं, वहां उन्हें देखकर एक छोटे प्रोड्यूसर का हिचकना स्वाभाविक है, लेकिन मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ यह कह सकता हूं कि उनके दिल में किसी के लिए कोई भेदभाव नहीं है. वह एक सरल इंसान हैं.’
वहीं, अमिताभ बच्चन से लेकर शाहरुख खान तक, हर बड़े कलाकार ने असफलता का दौर देखा है, लेकिन उन्होंने कभी इसके लिए देश या इंडस्ट्री के चरित्र पर सवाल नहीं उठाए. रहमान का बयान ‘थाली में छेद’ करने के समान है. उन्हें समझना चाहिए कि संगीत की कोई भाषा या धर्म नहीं होता. इसलिए मेरी समझ से रहमान साहब को ‘कम्युनल एंगल’ तलाशने के बजाय अपने गिरते हुए संगीत ग्राफ और ‘गोल्डन टच’ को वापस पाने पर ध्यान देना चाहिए.



