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सावा, कोदो और रागी जैसे पारंपरिक मोटे अनाज कभी ग्रामीण भारत की थालियों का अहम हिस्सा हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ ये अनमोल खजाने हमारी आदतों से गायब होते चले गए. आज जब जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां जैसे डायबिटीज…और पढ़ें
कौशांबी: एक समय था जब किसान सावा, कोदो और रागी जैसी पारंपरिक फसलों को सबसे ताकतवर मानते थे. यह मोटे अनाज न केवल पोषण से भरपूर हैं, बल्कि कैंसर, डायबिटीज, मोटापा और हृदय रोग जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने में भी बेहद कारगर साबित होते हैं. इन अनाजों में फाइबर, प्रोटीन, विटामिन और खनिज भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो पाचन तंत्र को बेहतर बनाने, हड्डियों को मज़बूती देने और हृदय को स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं.
इन फसलों की बुवाई जून से जुलाई के बीच बरसात शुरू होने से पहले की जाती है. किसानों द्वारा इनकी बुवाई छिड़काव विधि से की जाती है और इसे उगाने के लिए ज्यादा पानी या रासायनिक खाद की ज़रूरत नहीं होती. दोमट मिट्टी इस फसल के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है.
कृषि विशेषज्ञ भगवती प्रसाद के अनुसार, सावा, कोदो और रागी जैसे छोटे अनाज, मोटे अनाजों की तुलना में कहीं अधिक फाइबर युक्त होते हैं. वहीं ज्वार, बाजरा और मक्का जैसे मोटे अनाजों में प्रोटीन की मात्रा अधिक पाई जाती है. इन अनाजों का सेवन न केवल शरीर को संपूर्ण पोषण देता है बल्कि कई प्रकार की बीमारियों से भी बचाता है.
आज जब स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं, ऐसे में हमें फिर से पारंपरिक अनाजों की ओर लौटने की जरूरत है. सावा, कोदो और रागी जैसे अनाज न केवल स्वास्थ्यवर्धक हैं, बल्कि किसानों के लिए भी कम लागत में बेहतर उत्पादन का जरिया हैं.


