मध्य प्रदेश को डकैती मुक्त घोषित किए जाने के बावजूद 1000 से ज्यादा लोगों पर मामले दर्ज किए गए हैं। एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने पूछा कि क्यों न इस कानून को रद्द कर दिया जाए। हाई कोर्ट ने राज्य के गृह विभाग, डीजीपी सहित चंबल और ग्वालियर रेंज के एसपी को नोटिस जारी किया है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है कि 45 साल पुराने ‘मध्य प्रदेश डकैती और अपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम’ को क्यों न रद्द कर दिया जाए। यह कदम एक जनहित याचिका (पीआईएल) के बाद उठाया गया है। याचिका में बताया गया था कि राज्य को डकैती मुक्त घोषित किए जाने के बावजूद 2020 से अब तक इस कानून के तहत 1000 से ज्यादा लोगों पर मामले दर्ज किए गए हैं।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर बेंच ने गृह विभाग, पुलिस महानिदेशक और चंबल व ग्वालियर रेंज के पुलिस अधीक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी कर पूछा कि इस कानून को क्यों न रद्द कर दिया जाए। जस्टिस जीएस अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की डिविजनल बेंच ने राज्य सरकार को इस कानून के तहत लंबित मामलों की स्थिति बताने का निर्देश दिया। ये नोटिस पूर्व गृह मंत्री और कांग्रेस नेता गोविंद सिंह द्वारा दायर जनहित याचिका पर जारी किए गए थे। इसमें उन्होंने इस कानून को असंवैधानिक घोषित करने और इसे रद्द करने की मांग की थी।
कांग्रेस नेता ने कहा कि यह कानून उन डकैतों से निपटने के लिए बनाया गया था जो अब मौजूद नहीं हैं। फिर भी, धारा 11 और 13 (जिनमें जमानत नहीं मिलती) का इस्तेमाल आम संपत्ति विवादों, चोरी या झगड़ों में भी लोगों के अधिकारों को दबाने के लिए किया जाता है। निर्दोष नागरिकों को अग्रिम जमानत नहीं दी जाती, जिससे समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।
याचिकाकर्ता के वकील राजीव शर्मा ने कहा कि यह कानून अक्टूबर 1981 में ग्वालियर, चंबल और विंध्य इलाकों के जंगलों में डकैती और अपहरण की घटनाओं को रोकने के लिए लाया गया था। उन्होंने कहा कि इसमें कड़ी सजा और स्पेशल कोर्ट का प्रावधान था। हालांकि, 2017 में तत्कालीन गृह मंत्री भूपेंद्र सिंह ने विधानसभा को बताया था कि सभी डकैत गिरोह खत्म कर दिए गए हैं। 2022 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश को डकैत मुक्त राज्य घोषित किया था।
वकील शर्मा ने याचिका में गृह विभाग के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि जब डकैत ही नहीं हैं तो लोगों पर अभी भी इस कानून के तहत केस क्यों दर्ज किए जा रहे हैं? इन आंकड़ों के मुताबिक, 2020 से 2026 के बीच शिवपुरी, दतिया, ग्वालियर, भिंड, मुरैना और श्योपुर समेत छह जिलों में 1000 से ज्यादा लोगों पर इस कानून के तहत आरोप लगाए गए।



