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Para Powerlifter Jhandu Kumar: गरीबी, पोलियो और कोविड की दुश्वारियों को मात देकर नालंदा के झंडू कुमार ने संघर्ष की नई मिसाल कायम की है. कभी परिवार चलाने के लिए सब्जी बेचने और ई-रिक्शा चलाने वाले झंडू ने अपने पावरलिफ्टिंग के सपने को जिंदा रखने के लिए ई-रिक्शा तक बेच दिया. कोच राजिंदर सिंह रहेलू के मार्गदर्शन में गांधीनगर साई केंद्र पहुंचे झंडू ने 72kg वर्ग में 206kg लिफ्ट कर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया. बैंकॉक में कांस्य पदक जीतकर कॉमनवेल्थ गेम्स तक पहुंचे झंडू की यह कहानी अटूट आत्मविश्वास और फौलादी इरादों का प्रतीक है.
झंडू कुमार पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स में हिस्सा ले रहे हैं.
नई दिल्ली. झंडू कुमार ने कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 के मेंस हैवीवेट पैरा पावरलिफ्टिंग फाइनल में ब्रॉन्ज मेडल जीतकर इतिहास रच दिया. कभी अपने परिवार का पेट पालने के लिए ई-रिक्शा चलाने और सब्जियां बेचने वाले झंडू का यह सफर उनकी कड़ी मेहनत और अटूट संकल्प की एक अद्भुत मिसाल है.
झंडू कुमार (Jhandu Kumar) कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है, जहां संघर्ष की हर एक पराकाष्ठा पर एक इंसान की बेजोड़ इच्छाशक्ति भारी पड़ती है. बिहार के एक छोटे से गांव से निकलकर कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतकर देश का नाम रोशन करने वाले झंडू कुमार की जीवन यात्रा जुनून, त्याग और अटूट आत्मविश्वास की एक मिसाल है. बिहार के नालंदा जिले के हरनौत बाजार के रहने वाले 29 वर्षीय झंडू कुमार का जीवन कभी आसान नहीं रहा. महज पांच साल की उम्र में वे पोलियो की चपेट में आ गए थे. इस शारीरिक बाधा और पारिवारिक आर्थिक तंगहाली के बावजूद, उन्होंने कभी अपने सपनों से समझौता नहीं किया. वे बचपन से ही पावरलिफ्टिंग के प्रति जुनूनी थे और पैरा तथा सक्षम दोनों तरह की प्रतियोगिताओं में राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके थे.
झंडू कुमार (Jhandu Kumar) के परिवार का गुजारा हरनौत बाजार में सब्जी की दुकान से चलता था. उनका दिन सुबह-सवेरे ही शुरू हो जाता था. झंडू बताते हैं, हर दिन मैं लगभग 20 किलोमीटर दूर बिहार शरीफ जाता था ताकि ताजी सब्ज़ियां खरीद सकूं. फिर उन्हें बाजार लाकर बेचता था. शाम करीब 4 बजे काम खत्म करने के बाद ही मैं जिम में ट्रेनिंग के लिए जा पाता था.’ वे ‘रॉकस्टार जिम’ में अपने कोच गौतम सिंह के मार्गदर्शन में कड़ी मेहनत करते थे. लेकिन एक एथलीट के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है सही पोषण. झंडू की दैनिक कमाई लगभग 400 से 500 ही हो पाती थी, जबकि एक एथलीट के प्रोटीन सप्लीमेंट्स का ख़र्च ही करीब 1,000 रोजाना आता था. आहार और प्रशिक्षण के बीच तालमेल बिठाना उनके लिए एक रोज की लड़ाई थी.
झंडू कुमार ने ब्रॉन्ज मेडल जीतकर रचा इतिहास.
🇮🇳 BRONZE FOR BHARAT! 🥉



