Sonam Wangchuk News: सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का अनशन टूटने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में जंतर-मंतर पर चल रहा आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा की मांग को लेकर उनसे हाथ छुड़ाकर आगे बढ़ चुका है।
Sonam Wangchuk News: सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने गुरुवार की देर रात केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा के हाथों सरकार से अपनी तीन मांगों पर लिखित आश्वासन पाने के बाद 26 दिन का अनशन तोड़ लिया। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफा को केंद्र में रखकर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने शिक्षा व्यवस्था और पेपर लीक के मुद्दे पर 20 जून को जंतर-मंतर पर आंदोलन शुरू किया था। सोनम वांगचुक 28 जून को अनशन पर बैठे थे और 18 जुलाई से पुलिस की निगरानी में अस्पताल में भर्ती थे। मंत्री के इस्तीफा के बिना जब सोनम का अनशन तुड़वाने में सरकार कामयाब हो गई तो सीजेपी के सूत्रधार अभिजीत दीपके ने धर्मेंद्र प्रधान के पद से हटने तक जंतर-मंतर पर ही जमे रहने का ऐलान कर छात्र आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में ले ली है। अब सवाल उठता है कि अनशन तोड़कर भी आंदोलन खत्म नहीं करा सके 59 साल के पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को क्या हासिल हुआ।
पहले सोनम वांगचुक का एक संक्षिप्त परिचय ले लेते हैं। वो चार दशकों से शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में लद्दाख और लेह के इलाकों में काम कर रहे हैं। 1988 में उन्होंने लद्दाख छात्र शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक आंदोलन (SECMOL) बनाया, जिसने सरकार के साथ मिलकर शिक्षा व्यवस्था में सुधार के काम किए। बर्फीले क्षेत्र में पानी जमा करने के लिए आइस स्तूप बनाने वाले वांगचुक ने 2017 में पत्नी गीतांजलि आंग्मो के साथ मिलकर हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख (HIAL) की शुरुआत की। यहां स्टूडेंट्स जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, जल संरक्षण और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में आसान जीवन के लिए समाधानों पर काम करते हुए सीखते हैं।
2009 में आई फिल्म ‘थ्री इडियट्स’ में फुनसुख वांगडु बने आमिर खान के रोल को उनसे जोड़कर देखा गया तो लोगों की रुचि और जानकारी बढ़ी। लेकिन, अभी आंदोलन के दौरान आमिर ने साफ किया कि फिल्म सोनम पर नहीं बनी है। आमिकर खान ने कहा कि जब ये फिल्म बनी थी, तब ना वो और ना राजकुमार हीरानी वांगचुक को जानते थे। 2018 में सोनम को रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला। 2020 में जब भारत और चीन के बीच सीमा पर झड़प हुई तो सोनम ने चीनी सामानों के बहिष्कार की अपील की थी।
अपने इलाके के मसलों पर सक्रिय रहने वाले सोनम वांगचुक को 2025 में लद्दाख में राज्य के दर्जा और आदिवासी इलाकों को स्वायत्तता देने वाली छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन के दौरान गिरफ्तार कर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत गिरफ्तार कर जेल में बंद कर दिया गया था। स्थानीय निकाय को जमीन और सांस्कृतिक पहचान बचाए रखने से जुड़े कानून बनाने की ताहत देने के लिए लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल करवाने के मसले पर वह 2020 से अब तक कई बार अनशन और एक बार लेह से दिल्ली की पदयात्रा तक कर चुके है। यह सब जम्मू और कश्मीर के पुनर्गठन के बाद शुरू हुआ, जब लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया। लद्दाख में एलजी का शासन है। स्थानीय लोग अपनी सरकार मांग रहे हैं।
सोनम वांगचुक को जब 26 सितंबर 2025 को गिरफ्तार करके रासुका के तहत जोधपुर की जेल में भेज दिया गया, तब भी वो इसी मसले पर चले रहे आंदोलन में अनशन कर रहे थे। दो दिन पहले 24 सितंबर को स्थानीय संगठनों ने बंद बुलाया था, जिस दौरान भीड़ ने भाजपा और सरकार के दफ्तरों पर हमला कर दिया। इसमें पुलिस कार्रवाई में 4 लोगों की मौत हो गई थी। 10 सितंबर को 15 लोगों के साथ सोनम ने 35 दिनों तक चलने वाला अनशन शुरू किया था, लेकिन उपद्रव होते ही उसी दिन अनशन खत्म कर दिया। रासुका में जेल जाने के बाद उनकी पत्नी गीतांजलि ने सुप्रीम कोर्ट में मामले को कानूनी तरीके से लड़ा। 5 महीने में 24 बार डेट लगने के बाद कोर्ट का फैसला आने से पहले ही सरकार ने उनको 14 मार्च को छोड़ दिया।
170 दिन जेल में रहने के बाद सोनम वांगचुक जब बाहर आए, तब तक सूत्रों के हवाले से मीडिया के एक धड़े ने उन पर विदेशी एजेंट से लेकर देशद्रोही तक के आरोप लगा दिए थे। सरकार ने वांगचुक के संस्थान का विदेश चंदा लाइसेंस रद्द कर दिया। आयकर विभाग से लेकर सीबीआई तक सवालों के साथ उनके संस्थानों के पीछे पड़ गई। इसका उन पर इतना गहरा असर हुआ कि जब वो जेल से निकलकर पहली बार मीडिया के सामने आए तो खुद कहा- ‘अगर मैं देशद्रोही दिखा, आज वो खुद ही वापस ले रहे हैं। तो गलती हो गई, यही ना। वर्ना एक देशद्रोही को कैसे बाहर आप छोड़ेंगे। अगर छोड़ रहे हैं तो या तो धारणा में बदलाव आया या जो है, वो पता चला।’ उन्होंने यह भी कहा कि सबको जीवन में एक बार जेल जाना चाहिए, इससे किसी मुद्दे पर बोलने का साहस आता है।
तो अब लौटते हैं मूल सवाल पर कि जब आंदोलन का केंद्रीय मांग मंत्री का इस्तीफा ही नहीं हुआ तो खुद को ‘मानद कॉकरोच’ बताने वाले सोनम वांगचुक को क्या मिला।
- सबसे पहले और सबसे अहम तो रासुका जैसे गंभीर कानून के तहत जेल से निकलने के चार महीने के अंदर केंद्र सरकार से सम्मान और मान्यता मिली, जो उनके खिलाफ अनाप-शनाप लिखने वालों को करारा जवाब है। सरकार के दो-दो मंत्री बात करने गए और फिर सरकार का पत्र देकर अनशन तुड़वाया।
- अन्ना हजारे के लोकपाल आंदोलन के बाद देश में अपनी तरह का यह पहला बड़ा आंदोलन है। इस आंदोलन ने गांधीवादी तरीकों से अनशन को हथियार बनाकर सरकार को मुद्दों पर झुकाने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर उनकी पहचान को राष्ट्रीय फलक दे दिया है।
- लद्दाख में विधानसभा और इलाके को छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर सोनम कई साल से धरना, प्रदर्शन, अनशन और पदयात्रा कर रहे हैं। लेह और करगिल के निवासियों का संगठन सरकार से इस पर लंबे समय से बात भी कर रहा है। सरकार से बनी नई केमिस्ट्री का फायदा सोनम वांगचुक को लद्दाख के मसलों के समाधान में मिल सकता है।
- दिल्ली में आंदोलन का चेहरा बनने और सरकार से आश्वासन पत्र हासिल करने के बाद सोनम वांगचुक का कद लद्दाख में बहुत बढ़ जाएगा। लद्दाख के लोग उनके सामाजिक अभियानों में और बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे।
- सोनम वांगचुक की संस्थाओं के खिलाफ जो कार्रवाई पिछले साल सितंबर के बाद शुरू हुई थी, उससे उनके काम पर असर पड़ा है। अब विभागीय रवैए में बदलाव दिखेगा। इससे सोनम को शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में अपने काम को ठीक से आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।



