
ब्यूरो रिपोर्ट उत्तर प्रदेश।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद नीति निर्माण पर चर्चा तेज विशेषज्ञों ने बताया यह आर्थिक नहीं, सामाजिक सोच का मुद्दा।
लखनऊ। पीरियड लीव (मासिक धर्म अवकाश) को लेकर देशभर में बहस एक बार फिर तेज हो गई है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर सुनवाई करते हुए कहा कि अगर पीरियड लीव को अनिवार्य कर दिया गया, तो कंपनियां महिलाओं को नौकरी देने से कतराने लगेंगी। कोर्ट ने इसे नीतिगत मामला बताते हुए फैसला सरकार पर छोड़ दिया। इसी संदर्भ में बाबू बनारसी दास विश्वविद्यालय लखनऊ की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. अनामिका साहनी ने इस मुद्दे पर विस्तार से अपनी राय रखते हुए इसे “सुविधा नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और सम्मान का अधिकार” बताया है। डॉ. साहनी के अनुसार, दुनिया के कई देशों ने पीरियड लीव को अपनाकर इस ‘डर’ को गलत साबित किया है। Spain ने 2023 में पेड मेंस्ट्रुअल लीव को कानूनी मान्यता दी, जहां छुट्टी का खर्च सरकार वहन करती है, न कि कंपनी। वहीं Japan में 1947 से यह प्रावधान मौजूद है। इसके अलावा इंडोनेशिया और फिलीपींस में भी वर्षों से महिलाओं को पीरियड लीव का अधिकार दिया गया है। भारत में भी कुछ कंपनियों ने इस दिशा में पहल की है। Zomato ने 2020 में साल में 10 दिन की पीरियड लीव की घोषणा की थी। इसके बाद Swiggy समेत कई कंपनियों ने महिला कर्मचारियों के लिए अनुकूल नीतियां अपनाईं। कर्नाटक सरकार ने भी कर्मचारियों के लिए मासिक अवकाश का प्रावधान किया है विशेषज्ञों का कहना है कि कंपनियों का सबसे बड़ा डर उत्पादकता को लेकर होता है, जबकि शोध बताते हैं कि दर्द या अस्वस्थता में काम करने पर कर्मचारी की कार्यक्षमता 30% से अधिक घट जाती है। पीरियड के दौरान एक दिन का आराम न केवल स्वास्थ्य के लिए जरूरी है, बल्कि इससे कर्मचारी बेहतर प्रदर्शन के साथ काम पर लौटती हैं। डॉ. साहनी ने कहा कि यह बहस नई नहीं है। जब Maternity Benefit Act के तहत मातृत्व अवकाश 12 हफ्तों से बढ़ाकर 26 हफ्ते किया गया था, तब भी यही आशंका जताई गई थी कि इससे महिलाओं की नौकरी के अवसर कम हो जाएंगे। लेकिन आज यही नीति कॉर्पोरेट सेक्टर में ‘डायवर्सिटी’ का अहम हिस्सा बन चुकी है। लेख में यह भी कहा गया है कि पीरियड लीव का विरोध असल में समाज की पुरुष प्रधान मानसिकता को दर्शाता है। अगर किसी कंपनी में सिर्फ इसलिए महिलाओं को नौकरी नहीं दी जाती क्योंकि उन्हें महीने में एक दिन की छुट्टी चाहिए, तो यह समस्या महिलाओं की नहीं, बल्कि उस कंपनी की कार्यसंस्कृति की है।विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में भी स्पेन मॉडल अपनाया जा सकता है, जहां पीरियड लीव का आर्थिक भार सरकार उठाए। इसके अलावा टैक्स छूट या सब्सिडी के जरिए कंपनियों को प्रोत्साहित किया जा सकता है। साथ ही, पीरियड लीव को ‘वर्क फ्रॉम होम’ या ‘सेल्फ-केयर डे’ के रूप में भी लागू किया जा सकता है, जिससे महिलाओं को लचीलापन मिल सके। पीरियड लीव को केवल छुट्टी के रूप में नहीं, बल्कि महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और कार्यस्थल पर समान अवसर के अधिकार के रूप में देखने की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि सही नीति और सकारात्मक सोच के साथ यह कदम न केवल महिलाओं के लिए, बल्कि पूरे समाज और अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है।

