नई दिल्ली. दो फरवरी. खेल मंत्रालय भविष्य में बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट पर फार्मूला वन फिर से शुरू करने का इच्छुक है और 2013 में आखिरी बार भारत में हुई रेस को दोबारा शुरू करने के लिए ट्रैक अधिकारियों से बातचीत शुरू हो चुकी है. मंत्रालय के एक सूत्र ने बताया कि खेल मंत्री मनसुख मांडविया पिछले हफ्ते ग्रेटर नोएडा में ट्रैक का दौरा कर चुके हैं. उन्होंने यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण के अधिकारियों से भी बात की है, जिन्होंने अब दिवालिया हो चुके ट्रैक के मालिक जेपी समूह से परिसर अपने नियंत्रण में ले लिया है.
अडानी समूह जेपी समूह को खरीदने की दौड़ में है और अगर ऐसा हो गया तो भारत में रेस को वापस लाने की कोशिशों को मजबूती मिलेगी. अब खेल मंत्रालय ने भी इसमें रुचि दिखाई है तो संभावनाएं बढ़ गई हैं. भारत में 2011 से 2013 तक यह रेस हुई थी और फिर टैक्स और नौकरशाही से जुड़े मसलों के कारण इसे फार्मूला वन कैलेंडर से बाहर कर दिया गया था.
खेल मंत्री की पहल
खेल मंत्री ने पिछले हफ्ते ग्रेटर नोएडा में ट्रैक का दौरा किया और बुनियादी ढांचे से काफी प्रभावित हुए. उन्होंने प्रमोटरों से बात भी की कि रेस दोबारा कब शुरू हो सकती है. उन्होंने ट्रैक मालिकों से कहा कि किसी खेल प्रबंधन कंपनी को दो-तीन साल या कानूनी मामला खत्म होने तक ट्रैक सौंप दें.’ सूत्र ने आगे कहा, ‘एफवन की मेजबानी में टैक्स का मसला है लेकिन यह जल्दी ही सुलझ जाएगा.’ वैसे फार्मूला वन को भारत में लाने की राह आसान नहीं है. अभी कैलेंडर में 24 रेस हैं और दुनिया भर के देशों ने इसकी मेजबानी की इच्छा जताई है. एक फार्मूला वन रेस के आयोजन में दो करोड़ से छह करोड़ डॉलर सालाना खर्च होते हैं. भारत के पक्ष में यह बात है कि यहां पहले से ही बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट जैसा विश्व स्तरीय सर्किट है. भारत में हुई तीनों रेस बहुत सफल रही थीं.
भारत में फॉर्मूला वन का इतिहास
जब भारत में मोटरस्पोर्ट का नाम आता है, तो ज़हन में सबसे पहले रफ्तार, शोर और रोमांच की वो तस्वीर उभरती है, जो अब भी अधूरी-सी लगती है. एक ऐसा सपना, जिसमें फॉर्मूला-1 की गूंज, V8 इंजनों की दहाड़ और दुनिया के सबसे तेज़ ड्राइवर भारतीय सरज़मीं पर उतरने वाले थे. दशकों तक भारत सिर्फ़ यूरोप और एशिया के दूसरे देशों में होने वाली F1 रेस को टीवी स्क्रीन पर देखता रहा, लेकिन 2011 में वह इंतज़ार खत्म हुआ जब भारत ने आधिकारिक तौर पर फॉर्मूला-1 की दुनिया में कदम रखा.
ग्रेटर नोएडा में बना बुद्ध इंटरनेशनल सर्किट सिर्फ़ एक रेस ट्रैक नहीं था, बल्कि यह भारत की उस महत्वाकांक्षा का प्रतीक था, जो खुद को ग्लोबल स्पोर्टिंग मैप पर स्थापित करना चाहती थी. जर्मनी के दिग्गज ट्रैक डिज़ाइनर हर्मन टिल्के की कलम से निकला यह सर्किट उसी श्रेणी में खड़ा था, जहां सिल्वरस्टोन और मोंज़ा जैसे ऐतिहासिक ट्रैक मौजूद हैं। 2011 में जैसे ही पहली Indian Grand Prix की लाइट्स बुझीं और कारें रफ्तार के साथ आगे बढ़ीं, भारत ने साबित कर दिया कि वह सिर्फ़ क्रिकेट का देश नहीं है.
हालांकि, यह कहानी जितनी तेज़ रफ्तार से शुरू हुई, उतनी ही जल्दी ब्रेक भी लग गए. भारी टैक्स, सरकारी नीतियों और प्रशासनिक उलझनों के बीच भारत का F1 सफर तीन साल में ही थम गया लेकिन उन तीन सालों ने इतिहास रच दिया जहां सेबेस्टियन फेटेल का दबदबा, रेड बुल की बादशाहत और भारत का नाम F1 कैलेंडर पर हमेशा के लिए दर्ज हो गया.

