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Vir Chakra Awardee Major Manoj Talwar Story: कारगिल युद्ध के दौरान अदम्य साहस और शौर्य की मिसाल कायम करने वाले ‘वीर चक्र’ विजेता मेजर मनोज तलवार की कहानी हर भारतीय के रोंगटे खड़े कर देगी. मुजफ्फरनगर में जन्मे और सैन्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले मेजर मनोज ने डॉक्टर बनने के बजाय देशसेवा को प्राथमिकता दी. कारगिल में टुरटुक सेक्टर में उनके नाम पर ‘ऑपरेशन तलवार’ चलाया गया था. उन्होंने 13-14 जून 1999 की सर्द रात में माइनस टेंपरेचर में पॉइंट 5765 चोटी पर तिरंगा फहराया और मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया.
मेजर मनोज तलवार की कहानी
Major Manoj Talwar Story: भारतीय सेना के इतिहास में कई ऐसे जांबाज अफसरों के नाम दर्ज हैं, जिन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना देश की आन-बान और शान के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया. ऐसे ही अमर नायकों में शुमार हैं ‘वीर चक्र’ विजेता मेजर मनोज तलवार, जिन्हें कारगिल युद्ध के दौरान चलाए गए ऐतिहासिक ‘ऑपरेशन तलवार’ का नायक कहा जाता है.
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर स्थित गांधी कॉलोनी में 29 अगस्त 1969 को मेजर मनोज तलवार का जन्म हुआ. वे सैन्य परंपरा वाली पीढ़ी के तीसरे अधिकारी थे. उनके पिता कैप्टन पीएल तलवार सेना में एक सिविल इंजीनियर थे, जिन्होंने 1962 और 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान लद्दाख में दुनिया के सबसे ऊंचे हवाई अड्डों में से एक के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी. पिता की तैनाती के कारण उनका बचपन कानपुर छावनी के पास बीता. एक चित्रकला प्रतियोगिता में उन्होंने डॉक्टर या इंजीनियर बनने के बजाय एक ‘युद्ध दृश्य’ उकेरा था.
डॉक्टर बनने के बजाय चुना इन्फैंट्री अफसर का रास्ता
मेजर मनोज ने अपनी असाधारण प्रतिभा के बल पर एक साथ आर्म्ड फोर्सेज मेडिकल कॉलेज (AFMC) और नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) दोनों की प्रवेश परीक्षाएं पास कर ली थीं. उनके पास एक सुरक्षित डॉक्टर की जिंदगी चुनने का विकल्प था, लेकिन उन्होंने देश की अग्रिम मोर्चे पर रक्षा करने के लिए इन्फैंट्री अफसर बनना बेहतर समझा. दिसंबर 1992 में उन्हें महार रेजीमेंट की तीसरी बटालियन (3 महार) में कमीशन मिला. 1994 में उन्होंने महू से कमांडो ट्रेनिंग पूरी की. असम में ‘ऑपरेशन राइनो’ के दौरान उल्फा उग्रवादियों के सफाए में उनके बेजोड़ नेतृत्व के लिए उन्हें प्रतिष्ठित ‘सेना मेडल’ से भी नवाजा गया था.
कारगिल युद्ध और ऑपरेशन तलवार का आगाज
फरवरी 1999 में उन्हें विशेष मांग पर ‘आउट ऑफ टर्न’ तैनाती देकर 9 महार बटालियन के साथ सियाचिन के साल्तोरो रिज पर भेजा गया. मई 1999 में जब कारगिल की चोटियों पर पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कब्जा जमा लिया, तो टुरटुक सब-सेक्टर में दुश्मनों को खदेड़ने के लिए सेना ने एक विशेष अभियान की रूपरेखा तैयार की, जिसका नाम उनके नाम पर ‘ऑपरेशन तलवार’ रखा गया.
पॉइंट 5765 पर कब्जा और सर्वोच्च बलिदान
13 जून 1999 की अंधेरी और सर्द रात में, शून्य से 40 से 60 डिग्री नीचे के तापमान और खड़ी बर्फीली चट्टानों के बीच मेजर तलवार अपनी टुकड़ी के साथ आगे बढ़े. पाकिस्तानी सेना ने ऊपर से भारी तोपखाने और मोर्टार से भीषण गोलाबारी शुरू कर दी. इस हमले में एक जवान घायल हो गया, जिसके बाद मेजर तलवार ने खुद भारी मशीन गन संभाली और अपनी टुकड़ी को जवाबी कार्रवाई के लिए प्रेरित किया. ग्रेnead और मोर्टार के छर्रे लगने से वे बुरी तरह घायल हो चुके थे, लेकिन उन्होंने रणनीतिक रूप से दुश्मन को चकमा देने का आदेश जारी रखा.
13 और 14 जून की मध्यरात्रि को उन्होंने अपने प्राणों की बाजी लगाकर उस पॉइंट 5765 पर अधिकार कर लिया, जिसे जीतना आसान नहीं माना जाता था. उन्होंने उस दुर्गम चोटी पर तिरंगा फहरा दिया. तिरंगा फहराने के कुछ ही क्षणों बाद दुश्मन के एक मोर्टार शेल का छर्रा उनकी आंख में आ लगा और वे 19,000 फीट गहरी खाई में गिर गए. मात्र 29 वर्ष की आयु में उन्होंने देश के लिए सर्वोच्च शहादत दी.
अमर हो गई उनकी शहादत
उनके अकल्पनीय शौर्य के लिए भारत सरकार ने उन्हें मरणोपरांत ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया. उनके सामरिक योगदान को सम्मान देते हुए पॉइंट 5765 का नाम हमेशा के लिए ‘तलवार टॉप’ और ‘तलवार बेस’ रख दिया गया. इसके अलावा 9 महार ने सियाचिन के तीसरे ग्लेशियर का नाम ‘मेजर मनोज तलवार ग्लेशियर’ रखा है. (IANS इनपुट्स)
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सिविल सर्विसेज की तैयारी करते-करते कब 4 साल पहले पत्रकारिता की ओर झुकाव हो गया पता ही नहीं चला. नाम दीप राज दीपक है. वर्तमान में News18 हिंदी के साथ जुड़े हुए हैं. पद सब-एडिटर …
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