कैबिनेट का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर फिर से सुनवाई करने वाला है। यह विवाद मई 2025 का है, जब शाह ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पहलगाम हमले के लिए जिम्मेदार आतंकवादियों के संदर्भ में कर्नल कुरैशी का जिक्र करते हुए उन्हें आतंकियों की बहन बताया था।
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मीडिया को जानकारी देने वाली भारतीय सेना की अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री कुंवर विजय शाह के सामने मोहन यादव सरकार चट्टान बनकर खड़ी हो गई है। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि मोहन यादव की अध्यक्षता में मध्य प्रदेश सरकार की कैबिनेट ने विजय शाह पर केस चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। उधर इस मामले को लेकर कांग्रेस ने बुधवार को राज्य सरकार पर निशाना साधा और इसे लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुख्यमंत्री मोहन यादव सहित पूरे मंत्रिमंडल को बर्खास्त करने की मांग की।
मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इस बारे में राष्ट्रपति को लिखे एक पत्र में कहा कि राज्य सरकार द्वारा विजय शाह के विरुद्ध अभियोजन की स्वीकृति नहीं देने का निर्णय एक ‘बड़बोले मंत्री’ को राजनीतिक संरक्षण देने के साथ उस व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह है, जिसमें सत्ता अपने राजनीतिक व्यक्ति को जवाबदेही से बचाने के लिए न्यायिक प्रक्रिया के सामने दीवार बनकर खड़ी हो रही है।
कांग्रेस ने यह पत्र एक दिन पहले हुई कैबिनेट की बैठक के अगले दिन लिखा। एनडीटीवी की एक रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों के हवाले से बताया गया कि मंगलवार को हुई कैबिनेट की नियमित बैठक के बाद एक अहम घटनाक्रम में, मध्य प्रदेश कैबिनेट ने शाह पर मुकदमा चलाने की मंजूरी न देने का फैसला किया। जबकि सुप्रीम कोर्ट की बनाई स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने शाह के खिलाफ कार्रवाई के लिए राज्य सरकार से मंजूरी मांगी है।
इस बारे में जानकारी देते हुए कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह ने पत्रकारों को बताया कि विजय शाह पर अभियोजन की मंजूरी देने का मामला सार्वजनिक रूप से जारी कैबिनेट एजेंडे का हिस्सा नहीं था। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि सामान्य एजेंडा पूरा होने के बाद, ज्यादातर अधिकारियों को मीटिंग रूम से बाहर जाने के लिए कहा गया और फिर शाह के मामले पर सीमित चर्चा हुई।
विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार खबरों बैठक में विजय शाह को अपने कैबिनेट सहयोगियों के सामने अपना पक्ष रखने और अपनी टिप्पणी, उसके बाद हुई जांच और SIT के नतीजों से जुड़े हालात समझाने का मौका दिया गया। इसके बाद कैबिनेट ने सामूहिक रूप से इस राय का समर्थन किया कि शाह पर केस चलाने की मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए।
अब कैबिनेट द्वारा अभियोजन की अनुमति देने से इनकार करने के बाद कैबिनेट के मिनिट्स मुख्यमंत्री मोहन यादव के पास भेजे जाएंगे। सीएम इसे राज्यपाल मंगुभाई पटेल को भेजेंगे। इसके बाद यह जिम्मेदारी राज्यपाल पर आ जाएगी कि केस चलाने की अनुमति दी जाए या नहीं। यदि वे भी कैबिनेट का फैसला बरकरार रखते हैं तो सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई अहम होगी।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर 31 अगस्त को फिर से सुनवाई करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर बनाई गई SIT ने अपनी जांच पूरी कर ली है और समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने से संबंधित भारतीय न्याय संहिता की धारा 196(1)(a) के तहत शाह पर मुकदमा चलाने की मंजूरी मांगी है।
उधर राज्य में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार ने भी राज्यपाल को पत्र लिखकर हस्तक्षेप करने की मांग की है और सवाल उठाया है कि किसी जांच एजेंसी के मुकदमा चलाने के अनुरोध को सिर्फ इसलिए क्यों रोका जाए क्योंकि आरोपी एक मंत्री है। सिंघार ने आरोप लगाया है कि मोहन यादव सरकार सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में गठित SIT के निष्कर्षों के बावजूद शाह को बचाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने राज्यपाल से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि मामले को निष्पक्ष रूप से निपटाया जाए और कानूनी प्रक्रिया के अनुसार मुक़दमा चलाने की अनुमति दी जाए।
इससे पहले जनवरी में, कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार को दो सप्ताह के अंदर मुकदमा चलाने की मंजूरी पर फैसला लेने का निर्देश दिया था। जब महीनों बाद भी मामला हल नहीं हुआ, तो कोर्ट ने मई में फिर से राज्य सरकार को फटकार लगाई थी और कहा था, बहुत हो गया। इसके साथ ही कोर्ट ने फैसला लेने के लिए राज्य सरकार को चार हफ्ते का समय दिया था।
कैबिनेट का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर फिर से सुनवाई करने वाला है। यह विवाद मई 2025 का है, जब शाह ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में पहलगाम हमले के लिए जिम्मेदार आतंकवादियों के संदर्भ में कर्नल कुरैशी का जिक्र करते हुए उन्हें आतंकियों की बहन बताया था।



