
कहीं बच्चों के पीले पड़ते दांत, कहीं बूढ़ों के कमजोर होते शरीर… शुद्ध पानी के लिए तरस रहे ग्रामीण; करोड़ों की योजना के बावजूद नदी-नालों और चुआंड का दूषित पानी पीने को मजबूर लोग
कुड़वा के पांडुचट्टान में ग्रामीणों का जोरदार प्रदर्शन, डीएम से तत्काल हस्तक्षेप की मांग; कार्यदायी संस्था की कार्यप्रणाली पर उठाए गंभीर सवाल
कोन/सोनभद्र | संवाददाता।
“साहब, हमारे गांव में नल तो लग गया, लेकिन पानी नहीं आया… बच्चे दूषित पानी पी रहे हैं, बुजुर्ग बीमार पड़ रहे हैं और हम आज भी नदी-नालों से पानी ढोने को मजबूर हैं। आखिर शुद्ध पानी का सपना कब पूरा होगा?”
यह दर्द है सोनभद्र जिले के नवसृजित विकास खंड कोन के उन ग्रामीणों का, जो वर्षों से फ्लोरोसिस और दूषित पेयजल की समस्या से जूझ रहे हैं। सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन की ‘हर घर नल’ योजना, जिसे ग्रामीणों को सुरक्षित और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू किया गया था, अब कई प्रभावित गांवों में सवालों के घेरे में है। ग्रामीणों का आरोप है कि योजना के तहत नल कनेक्शन तो लगाए गए, पाइपलाइन भी बिछाई गई, लेकिन कई घरों के नल आज भी सूखे पड़े हैं।
फ्लोरोसिस प्रभावित इलाकों में पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते ग्रामीणों का आक्रोश रविवार को फूट पड़ा। कुड़वा के टोला पांडुचट्टान में समाजसेवी गंगा प्रसाद यादव की अगुवाई में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने जोरदार प्रदर्शन किया। हाथों में अपनी पीड़ा और आक्रोश लिए प्रदर्शनकारियों ने जल निगम और कार्यदायी संस्था के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि हर्रा-कदरा ग्राम समूह पेयजल योजना का उद्देश्य भले ही शुद्ध पानी पहुंचाना था, लेकिन धरातल पर स्थिति बेहद निराशाजनक है। वर्षों बीतने के बावजूद कई गांवों में नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी है। ऐसे में लोगों को मजबूरी में फ्लोराइडयुक्त पानी, नदी-नालों और चुआंड जैसे असुरक्षित जलस्रोतों पर निर्भर रहना पड़ रहा है।
फ्लोरोसिस से जूझते लोग, फिर भी शुद्ध पानी का इंतजार
ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र के कई गांव पहले से ही फ्लोरोसिस की समस्या से प्रभावित हैं। ऐसे क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराना केवल सुविधा नहीं, बल्कि जीवन बचाने जैसा है। लेकिन विडंबना यह है कि जिन गांवों को सबसे पहले शुद्ध पानी मिलना चाहिए था, वहां आज भी लोग दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।
समाजसेवी गंगा प्रसाद यादव ने प्रदर्शन के दौरान कहा कि क्षेत्र के लोगों की पीड़ा वर्षों पुरानी है। उन्होंने आरोप लगाया कि दूषित और फ्लोराइडयुक्त पानी पीने का असर ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। बच्चों के दांत पीले पड़ने और लोगों के शरीर पर फ्लोरोसिस के प्रभाव की शिकायतें सामने आती रहती हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि कई परिवार सुबह उठते ही पानी की चिंता में लग जाते हैं। घर में बूढ़े, बच्चे और महिलाएं हैं, लेकिन नल में पानी नहीं आता। ऐसे में महिलाओं को कई बार दूर-दराज के जलस्रोतों तक जाना पड़ता है। बरसात के दिनों में नदी-नालों का पानी और अधिक दूषित हो जाता है, लेकिन मजबूरी ऐसी है कि उसी पानी का इस्तेमाल पीने और घरेलू जरूरतों के लिए करना पड़ता है।
लोगों का दर्द है कि सरकार ने नल दिया, पाइप दिया, कनेक्शन दिया, लेकिन पानी नहीं दिया। ग्रामीणों का सवाल है कि यदि नल से पानी ही नहीं आना था तो करोड़ों रुपये खर्च कर यह योजना आखिर किसके लिए बनाई गई?
32 गांवों और टोलों में वर्षों से जल संकट का आरोप
प्रदर्शनकारियों के अनुसार कचनरवा ग्राम पंचायत और आसपास के क्षेत्रों के असनाबांध वार्ड नंबर-3, बड़ाप, मधुरी, नरोइयादामर, रोहिनवादामर, बागेसोती, सिंगा, डुबवा, धौरवादामर, सेमरवादामर, गोबरदाहा, डीलवाहा, शिवाखाड़ी, धीचोरवा, बिछमरवा, केवाल, पीपरखाड़, भालुकूदर, गीधिया, ललकीदामर, करैइल, रोरवा, नकतवार, बहुआरा सहित करीब 32 गांवों और टोलों में जलापूर्ति वर्षों से प्रभावित होने या नियमित रूप से नहीं पहुंचने की शिकायत है।
ग्रामीणों ने बताया कि कई घरों में आधार कार्ड के आधार पर कनेक्शन दिए गए। लोगों को उम्मीद थी कि अब उनकी पानी की समस्या समाप्त हो जाएगी। मगर वर्षों बीतने के बाद भी कई परिवारों के नल सूखे पड़े हैं।
सबसे अधिक हैरानी की बात ग्रामीणों ने यह बताई कि पानी की टंकी से सटा बड़ाप गांव भी आज तक पूरी तरह नियमित जलापूर्ति से वंचित है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब टंकी के आसपास के गांवों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंच रहा है, तो दूरस्थ और दुर्गम इलाकों में बसे लोगों की स्थिति कितनी भयावह होगी।
कचनरवा के असनाबांध लिंक रोड वार्ड नंबर-3 के लोगों ने भी वर्षों से जलापूर्ति न होने की शिकायत की। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई स्तरों पर अपनी समस्या उठाई और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन तक शिकायत पहुंचाई, लेकिन अभी तक स्थायी समाधान नहीं मिल सका।
नदी-नाले और चुआंड बने मजबूरी का सहारा
स्थानीय लोगों के अनुसार सिधवादामर, कुड़वा और अन्य प्रभावित इलाकों में आज भी कई परिवार पानी के लिए प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भर हैं। नदी-नालों का पानी बरसात में मिट्टी और अन्य गंदगी से भर जाता है। इसके बावजूद ग्रामीणों के सामने वही पानी इस्तेमाल करने की मजबूरी है।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि एक ओर सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य लेकर चल रही है, दूसरी ओर फ्लोरोसिस प्रभावित गांवों के लोग आज भी पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कागजों में काम पूरा दिखाने और वास्तविक धरातलीय स्थिति के बीच भारी अंतर है।
कई ग्रामीणों ने कहा कि सुबह से शाम तक पानी की व्यवस्था में ही परिवार का काफी समय चला जाता है। जिस पानी को एक नल खोलते ही घर में पहुंचना चाहिए था, उसके लिए लोगों को अब भी पुराने और असुरक्षित स्रोतों की ओर जाना पड़ रहा है।
‘पाइप बिछे, नल लगे, लेकिन पानी कहां है?’
ग्रामीणों ने कार्यदायी संस्था विष्णु प्रकाश आर पुंगलिया लिमिटेड की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि योजना का काम कई जगह मानकों के अनुरूप नहीं हुआ। ग्रामीणों ने डीआई, एचडीपीई और एमडीपीई पाइपलाइन की गुणवत्ता तथा बिछाने की गहराई की जांच कराने की मांग की है।
लोगों का कहना है कि कई स्थानों पर पाइपलाइन पर्याप्त गहराई में नहीं बिछाई गई, जिसके कारण बारिश और अन्य परिस्थितियों में पाइप क्षतिग्रस्त होने की समस्या सामने आती है। पाइप टूटने से कई गांवों में जलापूर्ति बाधित हो जाती है।
ग्रामीणों का आरोप है कि पूर्व में विरोध और शिकायतों के बाद कुछ स्थानों पर आनन-फानन में खुले पाइप ढकने और नल कनेक्शनों की मरम्मत का काम शुरू किया गया, लेकिन वह भी स्थायी समाधान नहीं बन सका।
लोगों ने सवाल उठाया कि यदि परियोजना की योजना और तकनीकी ड्राइंग पहले से तैयार थी तो फिर नदी की धारा और पाइपलाइन व्यवस्था को लेकर बार-बार समस्या क्यों पैदा हुई। ग्रामीणों ने पूरे निर्माण कार्य और तकनीकी गुणवत्ता की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
ग्रामीणों का आरोप—कागजों में पूर्ण, जमीन पर अधूरी योजना
प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि कई स्थानों पर वास्तविक काम अधूरा होने के बावजूद कागजों में कार्य पूर्ण दिखाने का प्रयास किया गया। उनका कहना है कि नल कनेक्शन और मरम्मत के नाम पर कई जगह केवल खानापूर्ति की गई।
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ चुनिंदा कर्मचारियों द्वारा विभाग और आम जनता को वास्तविक स्थिति से अलग जानकारी दी जाती रही। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, जिन गांवों में पर्याप्त जलापूर्ति नहीं है, वहां भी योजना को सफल दिखाने की कोशिश की गई।
प्रदर्शन में शामिल लोगों ने आरोप लगाया कि कुछ स्थानों पर ग्राम प्रधानों और पंचायत की जल समितियों से प्रमाण पत्र लेकर तथा वीडियो तैयार कर योजना की स्थिति को बेहतर दिखाया गया। ग्रामीणों ने इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
उनका कहना है कि यदि सभी गांवों में वास्तव में पानी पहुंच रहा है तो फिर इतने बड़े क्षेत्र के लोग सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं।
‘गरीब की आवाज सुनने वाला कोई नहीं’
प्रदर्शन के दौरान लोगों का दर्द साफ दिखाई दिया। कई ग्रामीणों ने कहा कि वे वर्षों से अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। शिकायत करते हैं, आश्वासन मिलता है, लेकिन कुछ दिनों बाद स्थिति फिर वैसी की वैसी हो जाती है।
जिला पंचायत सदस्य छविंद्र नाथ, समाजसेवी गंगा प्रसाद यादव, बिहारी प्रसाद यादव और जयराम समेत अन्य ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि क्षेत्र में करीब दो वर्षों से कई जगह नियमित जलापूर्ति नहीं हो पा रही है।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि गरीब और दूरदराज के गांवों की आवाज प्रभावी ढंग से नहीं सुनी जा रही। फ्लोरोसिस प्रभावित क्षेत्रों में पानी की समस्या केवल विकास कार्य की कमी नहीं, बल्कि लोगों के जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर सवाल है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय रहते शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं की गई तो आने वाले समय में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं।
कर्मचारियों के कथित शोषण का मामला भी उठा
प्रदर्शन के दौरान कार्यदायी संस्था से जुड़े कुछ कर्मचारियों के कथित शोषण का मुद्दा भी उठाया गया। स्थानीय लोगों के अनुसार, कुछ सुपरवाइजरों द्वारा कर्मचारियों पर मानसिक दबाव बनाने और श्रम नियमों के विपरीत व्यवहार किए जाने की शिकायतें हैं।
आरोप है कि कुछ कर्मचारियों को करीब 9 हजार रुपये का भुगतान किया जाता है, जबकि कई कर्मचारियों को दो-दो और तीन-तीन महीने तक वेतन नहीं मिलने की बात कही गई। स्थानीय लोगों का आरोप है कि भुगतान की मांग करने पर कुछ कर्मचारियों को काम से बाहर कर दिया जाता है।
ग्रामीणों ने कहा कि यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं तो इसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उन्होंने संबंधित विभाग से कर्मचारियों की समस्याओं को भी गंभीरता से लेने की मांग की है।
जल निगम के एई बोले—20 से 25 गांवों में शुरू हुई आपूर्ति
इस संबंध में जल निगम के एई ममूर अली ने कहा कि लगभग 20 से 25 गांवों में जलापूर्ति शुरू की जा चुकी है। उन्होंने बताया कि कुछ स्थानों पर पाइपलाइन क्षतिग्रस्त होने के कारण समस्या उत्पन्न हुई है।
एई ने कहा कि क्षतिग्रस्त पाइपों की मरम्मत कराई जाएगी और इसके बाद लोगों को नियमित पानी मिलने लगेगा। उन्होंने समस्या का जल्द समाधान कराने का भरोसा दिलाया।
हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि वे केवल आश्वासन नहीं, बल्कि अपने घरों के नलों से नियमित और शुद्ध पानी देखना चाहते हैं।
अब बड़ा सवाल—कब बुझेगी शुद्ध पानी की प्यास?
जल जीवन मिशन का सपना था कि गांव-गांव तक नल से सुरक्षित पेयजल पहुंचे, महिलाएं और बच्चे पानी ढोने की मजबूरी से मुक्त हों और फ्लोरोसिस प्रभावित क्षेत्रों के लोगों को दूषित पानी से निजात मिले।
लेकिन कोन क्षेत्र के ग्रामीणों का आरोप है कि उनके गांवों में यह सपना अभी अधूरा है। कहीं नल है तो पानी नहीं, कहीं पाइप है तो आपूर्ति नहीं, कहीं कनेक्शन है तो लाइन क्षतिग्रस्त है। ऐसे में करोड़ों रुपये की इस योजना की वास्तविक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री और जिलाधिकारी से मांग की है कि पूरे मामले का स्थलीय निरीक्षण कराया जाए। प्रत्येक प्रभावित गांव में जाकर देखा जाए कि वास्तव में कितने घरों तक पानी पहुंच रहा है और कितने नल केवल शोपीस बनकर रह गए हैं।
प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि पाइपलाइन की गुणवत्ता, निर्माण की गहराई, कनेक्शन, भुगतान और योजना की प्रगति की निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाए। यदि किसी स्तर पर अनियमितता या लापरवाही पाई जाती है तो दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों ने कार्यदायी संस्था के खिलाफ भी आरोपों की जांच कर उचित कार्रवाई की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी कि यदि जल्द शुद्ध पेयजल की नियमित व्यवस्था नहीं की गई तो प्रभावित गांवों के लोग बड़े आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।
ग्रामीणों की आखिरी उम्मीद प्रशासन पर
फ्लोरोसिस से प्रभावित इन गांवों के लोगों के लिए पानी केवल रोजमर्रा की जरूरत नहीं, बल्कि जिंदगी और मौत से जुड़ा सवाल बन चुका है। बच्चों की सेहत, बुजुर्गों की जिंदगी और पूरे परिवार का भविष्य सुरक्षित पानी पर टिका है।
आज भी कई ग्रामीणों के घरों में लगे नल जैसे एक सवाल बनकर खड़े हैं—
“नल तो लगा दिया, लेकिन पानी कब आएगा?”
नदी-नालों और दूषित जलस्रोतों से पानी भरकर घर लौटते ग्रामीण अब प्रशासन की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं। उनकी मांग केवल इतनी है कि जिस योजना के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए, उसका वास्तविक लाभ उन्हें भी मिले।
फ्लोरोसिस प्रभावित इन गांवों की पीड़ा अब एक ही सवाल पूछ रही है—क्या ‘हर घर नल’ योजना केवल कागजों और आंकड़ों में सफल होगी, या फिर सचमुच हर गरीब के घर तक शुद्ध पानी की एक बूंद पहुंचेगी?


