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September 21 Movie Review: रिश्तों की अहमियत को अच्छे से समझना हो तो देखें ‘सितंबर 21’

admin by admin
May 22, 2026
in बॉलीवुड
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September 21 Movie Review: रिश्तों की अहमियत को अच्छे से समझना हो तो देखें ‘सितंबर 21’


नई दिल्ली. कहा जाता है कि कुछ रिश्ते समय के साथ कमजोर नहीं होते, उन्हें बनाए रखने की जिम्मेदारी सिर्फ बढ़ती है. यह एक लाइन ही फिल्म ‘सितंबर 21’ की जान है. यह फिल्म उस मेंटल और इमोशनल नरक को बहुत अच्छे से दिखाती है जिससे एक परिवार गुजरता है, जब कोई धीरे-धीरे अपनी पहचान, अपना अतीत और अपने सबसे प्यारे चेहरों को भूलने लगता है. बॉलीवुड में बीमारियों का इस्तेमाल आम तौर पर सिर्फ सहानुभूति पाने या दर्शकों को रुलाने के लिए किया जाता रहा है. लेकिन, ‘सितंबर 21’ के लेखक और डायरेक्टर इस जाल से पूरी तरह बचते हैं. फिल्म की सादगी इसकी सबसे बड़ी यूएसपी बनकर उभरती है, जो दर्शकों को स्क्रीन से दर्शक की तरह नहीं बल्कि परिवार के अनदेखे सदस्यों की तरह चिपकाए रखती है.

कहानी
फिल्म ‘सितंबर 21’ की पूरी कहानी एक बहुत ही आम और खुशमिजाज मिडिल-क्लास परिवार के इर्द-गिर्द बुनी गई है. सब कुछ नॉर्मल लगता है, लेकिन फिर जिंदगी एक ऐसा मोड़ लेती है जब परिवार का सबसे मजबूत पिलर धीरे-धीरे अल्जाइमर बीमारी (याददाश्त खोने की एक गंभीर बीमारी) का शिकार होने लगता है. यह छोटी-मोटी भूल से शुरू होती है- जैसे चाबियां कहां हैं यह भूल जाना या किसी का नाम याद करने में थोड़ा समय लगना… लेकिन धीरे-धीरे यह समस्या एक बहुत बड़े और डरावने मेंटल स्ट्रेस में बदल जाती है. जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, घर का हर किरदार गहरे इमोशनल डिप्रेशन, बेबसी और निराशा का अनुभव करता है. जहां अतीत की यादें धुंधली हो जाती हैं, वहीं वर्तमान में अपनों को खोने का डर परिवार के बाकी सदस्यों का टेस्ट लेने लगता है. स्क्रिप्ट की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इस भारी उदासी के बीच भी कहानी अपनी पॉजिटिविटी और प्यार बनाए रखती है. परिवार के सदस्यों की करीबी, उनके संघर्ष और मुश्किल हालात में भी एक-दूसरे का हाथ थामे रहने का उनका इरादा कहानी में एक नई रोशनी डालता है. लेखक ने सीन इतनी आसानी से लिखे हैं कि कई मामलों में बिना किसी लंबी-चौड़ी स्पीच या डायलॉग के भी अकेले किरदारों की खामोश बेबसी दर्शकों की आंखों में आंसू ला देती है.

एक्टिंग
एक्टिंग के मामले में यह फिल्म एक मास्टरक्लास साबित होती है. लीड रोल में प्रियंका उपेंद्र ने ऐसी परफॉर्मेंस दी है जिसे उनके करियर की सबसे यादगार परफॉर्मेंस में गिना जाएगा. उन्होंने अपने कैरेक्टर के अंदर के टकराव, एक मां, पत्नी और बेटी के तौर पर अपनी जिम्मेदारियों और अपने अंदर की उथल-पुथल को बहुत खूबसूरती से दिखाया है. उनकी आंखों का खालीपन और अपनों को पहचानने की कोशिश का दर्द दर्शकों पर सीधा असर डालता है. वह कभी भी अपनी परफॉर्मेंस को लाउड या ओवर-द-टॉप नहीं होने देतीं, जो ऐसे कैरेक्टर के लिए जरूरी है. लीड मेल रोल में प्रवीण सिंह सिसोदिया कहानी को मजबूत सपोर्ट देते हैं. प्रवीण एक ऐसे आदमी का रोल निभाते हैं जो अपने काम, समाज और घर पर अपनी मां या जीवनसाथी की बदलती मेंटल हालत के बीच बैलेंस बनाने की कोशिश कर रहा है, बहुत ही रियलिस्टिक तरीके से. उनके इमोशनल स्ट्रगल, उनका गुस्सा और फिर उनकी अचानक लाचारी स्क्रीन पर बिल्कुल असली लगती है. वेटरन एक्ट्रेस जरीना वहाब की मौजूदगी फिल्म के कैनवस में गहराई जोड़ती है. उनकी शांत और इज्जतदार मौजूदगी हर फ्रेम में एक नया वजन जोड़ती है जिसमें वह दिखती हैं. बिना एक शब्द बोले भी, उनकी स्क्रीन प्रेजेंस एक साथ आराम और दर्द का एक अनोखा एहसास कराती है. अमित बहल और रिकी रुद्र भी अपने छोटे, लेकिन जरूरी रोल पूरी ईमानदारी से निभाते हैं. पूरी स्टार कास्ट ऐसा माहौल बनाती है कि ऐसा नहीं लगता कि आप कोई मूवी देख रहे हैं, बल्कि ऐसा लगता है जैसे आप अपने ही पड़ोस के किसी घर की कहानी देख रहे हैं.

डायरेक्शन
डायरेक्टर करेन क्षिति सुवर्णा इस फिल्म की असली लीडर और नैरेटर हैं. किसी सेंसिटिव सब्जेक्ट को फिल्माते समय, डायरेक्टर के बहक जाने या फिल्म के डॉक्यूमेंट्री बन जाने का रिस्क रहता है. हालांकि, कैरन ने यहां बहुत समझदारी दिखाई है. उन्होंने कहानी को ज्यादा ड्रामैटिक या मेलोड्रामैटिक बनाने के कमर्शियल लालच से पूरी तरह परहेज किया है. कैरन के डायरेक्शन का स्टाइल यूरोपियन सिनेमा से काफी प्रभावित लगता है, जहां खामोशी को भी एक कैरेक्टर के तौर पर इस्तेमाल किया गया है. फिल्म में कई सीन ऐसे हैं जहां कोई बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं है, कोई बातचीत नहीं है, सिर्फ कैरेक्टर्स की शांति है और यही शांति दर्शकों को बहुत दुख पहुंचाती है. उन्होंने छोटे, इमोशनल पलों को जैसे सुबह की चाय का कप पकड़े रहना, पुरानी तस्वीरों को देखना या बिना किसी वजह के मुस्कुराना बहुत ही बारीकी से कैप्चर किया है. इसलिए पूरी फिल्म में कोई बनावटीपन या जबरदस्ती का इमोशन नहीं है.

सिनेमैटोग्राफी और टेक्निकल पहलू
टेक्निकली ‘सितंबर 21’ एक बहुत ही शांत और खूबसूरत फिल्म है. फिल्म की सिनेमैटोग्राफी इसके मूड और सेटिंग को पूरी तरह से दिखाती है. कैमरामैन ने रंगों का इस्तेमाल सोच-समझकर किया है. जैसे-जैसे कहानी में किरदारों की भाव बदलते हैं, फ्रेम के कलर टोन भी बदलते हैं. इनडोर शॉट्स को इस तरह से लाइट किया गया है कि वे एक साथ घर की गर्माहट और अंदर के अकेलेपन को दिखाते हैं. कई क्लोज-अप इतने शानदार हैं कि वे एक्टर्स के चेहरे की हर बारीक लाइन और टेंशन को साफ-साफ दिखाते हैं.

म्यूजिक और बैकग्राउंड स्कोर
फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर एक और मजबूत पिलर है. कंपोजर ने दिखाया है कि उन्हें इस बात की गहरी समझ है कि कहां म्यूजिक की जरूरत है और कहां शांति की. फिल्म का थीम म्यूजिक बहुत सॉफ्ट और धीमा है, जो सीन के अंदरूनी दर्द और इमोशन को उभारने में मदद करता है. यह दर्शकों के कानों को परेशान नहीं करता, बल्कि कहानी के साथ एक अनदेखी नदी की तरह बहता है. गानों का इस्तेमाल भी कहानी की रफ्तार में रुकावट नहीं डालता, बल्कि वे इसे आगे बढ़ाने में मदद करते हैं.

कमियां और खामियां
अपनी कई खूबियों और सेंसिटिव अप्रोच के बावजूद, ‘सितंबर 21’ ऐसी फिल्म नहीं है जो सभी दर्शकों को पूरी तरह से सैटिस्फाई कर सके. फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी धीमी रफ्तार है. डायरेक्टर ने कहानी को बनाने और किरदारों का दर्द दिखाने में बहुत ज्यादा समय लिया है. कुछ जगहों पर सीन इतने लंबे और रुके हुए लगते हैं कि तेज रफ्तार वाले सिनेमा के आदी आम दर्शक का सब्र जवाब दे सकता है. दूसरे हाफ में कहानी कुछ जगहों पर एक जैसे पैटर्न को फॉलो करती हुई लगती है, जिससे दोहराव जैसा महसूस होता है. अगर फिल्म की एडिटिंग में 15-20 मिनट की कटौती की गई होती, तो इसका असर और भी गहरा और दमदार हो सकता था. इसके अलावा, कमर्शियल सिनेमा में दिलचस्पी रखने वाले दर्शकों के लिए इसमें कोई मसाला, लाउड कॉमेडी या जबरदस्ती के ट्विस्ट नहीं हैं, जो इसकी पहुंच को सीमित करते हैं.

अंतिम फैसला
कुल मिलाकर ‘सितंबर 21’ बॉलीवुड के मौजूदा दौर में एक बहुत जरूरी, ईमानदार और अच्छी तरह से बनाई गई फिल्म है. यह एक ऐसी कला है जो अपनी सफलता की कहानी बॉक्स ऑफिस बिलों की गड़गड़ाहट से नहीं, बल्कि अपने किरदारों के आंसुओं और मुस्कान से लिखती है. शानदार एक्टिंग, मैच्योर डायरेक्शन और गहरी ईमानदार कहानी के साथ, यह फिल्म भीड़ से अलग एक मजबूत पहचान बनाने में कामयाब होती है. यह धीरे-धीरे दर्शकों के दिलों पर असर डालती है और आपको आखिर तक बांधे रखती है. मेरी ओर से फिल्म को 5 में से 3.5 स्टार.



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