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जब 6 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा पर पहला परमाणु बम गिरा सुतोमु यामागुची वहीं पर था. वह इस विस्फोट में बच गए. तीन दिन बाद वह नागासाकी पहुंच गए, जहां एक बार फिर से बम से बच गए. पेश है उनकी कहानी…
सुतोमु यामागुची- ‘जाको राखे साइयां, मार सके न कोई…’ सुतोमु यामागुची हिरोशिमा में थे जब पहला बम गिराया गया था. वह बच गए और बाद में 9 अगस्त को नागासाकी में हुए बम विस्फोट में भी बच गए. जिस दिन दूसरा बम गिराया गया था. यामागुची को आधिकारिक तौर पर दोनों परमाणु बम विस्फोटों में जीवित बचे एकमात्र व्यक्ति के रूप में मान्यता दी गई थी. 2010 में 93 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया. लेकिन वह दोनों विस्फोटों से कैसे बच गए? आइए इस पर एक नजर डालते हैं…
कौन थे सुतोमु यामागुची?
सुतोमु यामागुची हिरोशिमा छोड़ने की तैयारी कर रहे थे जब पहला परमाणु बम गिराया गया. उस समय उनकी उम्र 29 साल थी और वह मित्सुबिशी हैवी इंडस्ट्रीज में इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे. हिस्ट्री डॉट कॉम के अनुसार वह तीन महीने के बिजनेस ट्रिप पर गए थे. 6 अगस्त 1945, शहर में उनका अंतिम दिन था. उन्होंने और उनके सहयोगियों ने गर्मियों में एक नए तेल टैंकर की योजना पर काम किया था. यामागुची अपनी पत्नी हिसाको और अपने नन्हे बेटे कत्सुतोशी के पास घर लौटने के लिए बेताब थे.
हिरोशिमा बमबारी में कैसे बच गए?
6 अगस्त को जब वह जाने की तैयारी कर रहे थे तो हिरोशिमा का आसमान अचानक बदल गया. मेरिका ने अपना पहला परमाणु बम गिराया, जिसका नाम ‘लिटिल बॉय’ था. यामागुची ने ऊपर देखा तो एक अमेरिकी बी-29 बमवर्षक विमान उड़ रहा था. उसने पैराशूट से जुड़ी एक छोटी सी वस्तु छोड़ी. कुछ ही पल बाद आसमान एक तेज चमक से भर गया. बाद में उन्होंने इसे एक विशाल मैग्नीशियम चमक की बिजली जैसा बताया. वह खुद को बचाने के लिए एक खाई में कूद गए. लेकिन विस्फोट ने उन्हें जमीन से ऊपर खींच लिया. झटके की लहर ने उन्हें हवा में उछालकर पास के आलू के खेत में फेंक दिया.
काले आसमान में बदल गई उजली सुबह
जब उन्हें होश आया, तो उनके आस-पास सब कुछ अंधेरा था. विस्फोट ने उस उजली सुबह को काले आसमान में बदल दिया था. हिस्ट्री डॉट कॉम के अनुसार उनका चेहरा और हाथ बुरी तरह जल गए थे और दोनों कान के पर्दे फट गए थे. राख भारी मात्रा में गिर रही थी और वह शहर के ऊपर मशरूम के आकार का बादल उठता हुआ देख सकते थे. यामागुची स्तब्ध होकर मित्सुबिशी शिपयार्ड के अवशेषों की ओर बढ़े. वहां उन्हें अपने सहकर्मी अकीरा इवानगा और कुनियोशी सातो मिले जो बच गए थे. उस रात तीनों ने एक हवाई हमले वाले बंकर में शरण ली. 7 अगस्त को जब उन्हें पता चला कि रेलवे स्टेशन अभी भी चल रहा है तो वे वहां से निकल पड़े.
नागासाकी बमबारी में कैसे बचे यामागुची?
अपनी पत्नी और बच्चे के पास लौटने के बाद सुतोमु यामागुची ने 8 अगस्त को एक स्थानीय अस्पताल में इलाज करवाया. उनकी चोटें इतनी गंभीर थीं कि उनके अपने परिवार वाले भी उन्हें पहले पहचान नहीं पाए. रिपोर्ट के अनुसार जब वह घर पहुंचे तो उन्हें बुखार था और शरीर पर पट्टियां बंधी हुई थीं. उनकी मां ने उन्हें भूत समझ लिया. कमजोर होने और मुश्किल से चलने-फिरने में सक्षम होने के बावजूद यामागुची 9 अगस्त की सुबह बिस्तर से उठे और मित्सुबिशी के नागासाकी कार्यालय में काम करने चले गए. वह एक मीटिंग में गए जहां कंपनी के एक निदेशक ने उनसे हिरोशिमा में हुई घटना के बारे में बताने को कहा. जैसे ही यामागुची ने यह बताने की कोशिश की कि कैसे एक बम ने पूरे शहर को तबाह कर दिया. बाहर का आसमान अचानक एक चमकदार सफेद चमक से जगमगा उठा. शॉकवेव आने से कुछ ही सेकंड पहले यामागुची जमीन पर गिर पड़े. विस्फोट से दफ्तर की खिड़कियां टूट गईं. शीशा और मलबा पूरे कमरे में बिखर गया.
93 साल की उम्र में हुआ निधन
बाद में द इंडिपेंडेंट को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “मुझे लगा कि मशरूम बादल हिरोशिमा से मेरा पीछा कर रहा है.” 2009 में अपनी मृत्यु से एक साल पहले यामागुची ने पत्रकारों से कहा था, “मेरा दोहरा रेडिएशन जोखिम अब एक आधिकारिक सरकारी रिकॉर्ड है. यह मेरे मरने के बाद भी युवा पीढ़ी को परमाणु बम विस्फोटों का भयावह इतिहास बता सकता है. यामागुची का 2010 में 93 वर्ष की आयु में पेट के कैंसर से जूझने के बाद निधन हो गया.
‘निजु हिबाकुशा’ के रूप में मान्यता
ऐसा माना जाता है कि लगभग 165 लोगों ने दोनों परमाणु बम विस्फोटों का अनुभव किया होगा. हालांकि यामागुची एकमात्र व्यक्ति थे जिन्हें जापानी सरकार ने आधिकारिक तौर पर ‘निजु हिबाकुशा’ के रूप में मान्यता दी थी. जिसका अर्थ है ‘दो बार बम से मारा गया व्यक्ति’. जापान परमाणु बम हमलों का शिकार होने वाला एकमात्र देश है. द वॉशिंगटन पोस्ट के अनुसार हिरोशिमा में लगभग 1,40,000 और नागासाकी में 70,000 लोग मारे गए थे.
